Friday, July 19, 2019

बैरिस्टर मुकुंदी लाल

 उत्तराखंड की महान हस्ती मुकुंदी लाल  (बैरिस्टर)।



मुकुंदी लाल  (बैरिस्टर)
नाम- मुकुंदी लाल।
जन्म- 14 अक्टूबर 1885।
जन्म स्थान- पाटली गांव, मल्ला नागपुर पट्टी, जिला अल्मोड़ा, उत्तराखंड
शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा गांव के मिशन स्कूल में हुई। उसके बाद हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की शिक्षा रैमजे कॉलेज अल्मोड़ा से प्रथम श्रेणी में पास की। 1911 में इलाहाबाद से स्नातक की डिग्री प्राप्त की, बाद में श्री घनानन्द खंडूरी द्वारा मिली आर्थिक मदद से इंग्लैंड जाकर 1919 में बार 8 लोग की डिग्री प्राप्त की। इंग्लैंड में शिक्षा के दौरान कई दार्शनिक एवं साहित्यकारों से मिलना जुलना हुआ इंग्लैंड में मुकुंदी लाल कई दार्शनिकों के और मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित हुए। इसी दौरान उनकी मुलाकात महात्माा गांधी से हुई।

राजनीतिक जीवन-
       सन 1919 में भारत लौटने के दौरान मुंबई पहुंचने पर मार्क्सवादी साहित्य साथ लाने के कारण खुफिया पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद इलाहाबाद पहुंचने पर कांग्रेश के बड़े नेताओं मोतीलाल नेहरू जवाहरलाल नेहरू महात्मा गांधी आदि के विचारों से प्रभावित होकर कांग्रेस की सदस्यता ली। 1919 में लैंसडाउन उत्तराखंड से वकालत प्रारंभ की 1919 में कांग्रेस के अमृतसर अधिवेशन में उत्तराखंड के प्रतिनिधिमंडल को साथ लेकर भाग लिया। जहां इनकी मुलाकात मोहम्मद अली जिन्ना से हुई, उत्तराखंड में 800 लोगों को कांग्रेस की सदस्यता दिलाई, 1923 एवं 1926 में बैरिस्टर के नाम से विख्यात हो चुके मुकुंदी लाल प्रांतीय काउंसिल के सदस्य के रूप में चुने गए। 1927  में  इन्हें प्रांतीय काउंसिल का उपाध्यक्ष चुना गया। 1930 में इन्होंने कांग्रेसी छोड़ दी। 1936 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में प्रांतीय काउंसिल का चुनाव लड़ा। लेकिन पराजित हुए 1962 में गढ़वाल सीट से निर्दलीय विधानसभा चुनाव जीता। तत्पश्चात पुनः कांग्रेस में शामिल हो गए। 1967 में सक्रिय राजनीति से सन्यास  ले लिया।

भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रियता-

               1919 में  स्वदेश लौटने  की बाद से ही  स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए थे।  इंग्लैंड में महात्मा गांधी से मुलाकात के दौरान उनके स्वदेशी विचारों से प्रभावित हुए। 1921 में समूचे उत्तराखंड में कुली बेगार आंदोलन  आग की तरह फैल चुका था।  मुकुंदी लाल इस आंदोलन में कूद पड़े और पूरेेेे उत्तराखंड जगह-जगह घूम घूम कर लोगोंं को इस आंदोलन सेे जोड़ा और इस आंदोलन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण निभाई। सन 1930 में बैरिस्टर मुकुंदी लाल कांग्रेस छोड़कर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और पेशावर कांड के सिपाहियों की पैरवी के लिए एबटाबाद चले गए। जहां अपनी दमदार पर बहस से  पेशावर कांड के सिपाहियों को फांसी की सजा से बचाने में कामयाब रहे। इसके बाद 1938 से 1943 तक यह टिहरी रियासत के हाई कोर्ट के जज रहे। फिर 16 साल अरपेन्टाइल फैक्ट्री बरेली के जनरल मैनेजर रहे।

अन्य-
           एक लेखक, पत्रकार, संपादक, संग्रहकर्ता, दूरदर्शी के रूप में इन्होंने अपना परचम लहराया। मौलाराम के चित्रों को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मौलाराम के चित्रों के संग्रहण के ऊपर इनकी एक पुस्तक गढ़वाल पेंटिंग्स का प्रकाशन 1969 में भारत सरकार द्वारा किया गया। उत्तराखंड में मौलाराम स्कूल ऑफ आर्ट्स की स्थापना का श्रेय इन्हें ही जाता है। इन्होंने लैंसडाउन में तरुण कुमाऊं नाम से मासिक पत्रिका का संपादन और प्रकाशन किया। इसके अलावा बैरिस्टर एक कुशल शिकारी भी रहे, इन्होंने 5 शेर और 23 बाघों का शिकार किया, कोटद्वार स्थित उनके घर भारती भवन में दुर्लभ फूलों और पक्षियों का एक संग्रहालय है। बैरिस्टर ने अपने जीवन में आर्य समाजी, ईसाई, सिख, हिंदू और बौद्ध धर्म अपनाए। बुध के रूप में 10 जनवरी 1982 में निर्वाण प्राप्त हुआष बैरिस्टर मुकुंदी लाल उत्तराखंड के सच्चे सपूत थे, इनका योगदान उत्तराखंड के इतिहास में स्वर्णिम रहेगा।

Tuesday, July 16, 2019

Dedicated to Lord Shiva's elder son Kartikeya कार्तिक स्वामी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यता !!

Dedicated to Lord Shiva's elder son Kartikeya कार्तिक स्वामी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यता !!






कार्तिक स्वामी मंदिर देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में कनक चौरी गाँव से 3 कि.मी. की दुरी पर क्रोध पर्वत पर स्थित है | यह मंदिर समुद्र की सतह से 3048 मीटर की ऊँचाई पर स्थित शक्तिशाली हिमालय की श्रेणियों से घिरा हुआ है | कार्तिक स्वामी मंदिर रुद्रप्रयाग जिले का सबसे पवित्र पर्यटक स्थलों में से एक है | यह मंदिर उत्तराखंड का सिर्फ एकमात्र मंदिर है , जो कि भगवान कार्तिक को समर्पित है | भगवान कार्तिकेय का अति प्राचीन “कार्तिक स्वामी मंदिर” एक दैवीय स्थान होने के साथ साथ एक बहुत ही खूबसूरत पर्यटक स्थल भी है । मंदिर भगवान् शिव के जयेष्ठ पुत्र “भगवान कार्तिक” को समर्पित है | भगवान कार्तिक स्वामी को भारत के दक्षिणी भाग में “कार्तिक मुरुगन स्वामी” के रूप में भी जाना जाता है ।



क्रोध पर्वत पर स्थित इस प्राचीन मंदिर को लेकर मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय आज भी यहां निर्वांण रूप में तपस्यारत हैं। मंदिर में लटकाए सैकड़ों घंटी से एक निरंतर नि वहां से करीब 800 मीटर की दूरी तक सुनी जा सकती है।यह मंदिर बारह महीने श्रद्धालुओं के लिये खुला रहता है और मंदिर के प्रांगण से चौखम्बा, त्रिशूल आदि पर्वत श्रॄंखलाओं के सुगम दर्शन होते हैं। बैकुंठ चतुर्दशी पर्व पर भी दो दिवसीय मेला लगता है। कार्तिक पूर्णिमा पर यहां निसंतान दंपति दीपदान करते हैं। यहां पर रातभर खड़े दीये लेकर दंपति संतान प्राप्ति की कामना करतेे हैं, जो फलीभूत होती है। कार्तिक पूर्णिमा और जेठ माह में आधिपत्य गांवों की ओर से मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान भी किया जाता है।




कार्तिक स्वामी मंदिर के बारे में पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों को भगवान कार्तिक और भगवान गणेश से यह कहा कि उनमें से एक को पहले पूजा करने का विशेषाधिकार प्राप्त होगा , जो सर्वप्रथम ब्रह्मांड का परिक्रमा (चक्कर) लगाकर उनके सामने आएगा । भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर विश्व परिक्रमा को निकल पड़े । जबकि गणेश गंगा स्नान कर माता-पिता की परिक्रमा करने लगे।




 गणेश को परिक्रमा करते देख शिव-पार्वती ने पूछा कि वे विश्व की जगह उनकी परिक्रमा क्यों कर रहे हैं तो गणेश ने उत्तर दिया कि माता-पिता में ही पूरा संसार समाहित है। यह बात सुनकर शिव-पार्वती खुश हुए और भगवान गणेश को पहले पूजा करने का विशेषाधिकार प्राप्त दिया | इधर विश्व भ्रमण कर लौटते समय कार्तिकेय को देवर्षि नारद ने पूरी बातें बताई तो , कार्तिकेय नाराज हो गए और कैलाश पहुंचकर उन्होंने अपना मांस माता पार्वती को और शरीर की हड्डिया पिता ह्सिव जी को सौंप निर्वाण रूप में तपस्या के लिए क्रोध पर्वत पर पहुँच गए। तब से भगवान कार्तिकेय इस स्थान पर पूजा होती है और यह माना जाता है कि ये हड्डियाँ अभी भी मंदिर में मौजूद हैं जिन्हें हज़ारों भक्त पूजते हैं




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