कुमाऊं का लोक पर्व त्योहार खतड़ुवा-
Tuesday, October 11, 2022
खतड़वा: एक त्योहार और कुमाऊं का वीर सैनिक
Tuesday, July 27, 2021
हरेला प्रकृति के साथ रिश्तो का पर्व
हरेला मूल रूप से उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में मनाया जाता है। हरेला पर्व 1 साल में तीन बार मनाया जाता है..........
1. पहली बार चैत्र महीने में पहले दिन बोया जाता है और नवमी के दिन काटा जाता है।
2. दूसरा सावन के महीने में सावन लगने के 9 दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और सावन महीने के पहले दिन काट दिया जाता है।
3. तीसरा अश्विन माह में नवरात्र के पहले दिन बुरा जाता है और दशहरे के दिन काट दिया जाता है।
चैत्र और आश्विन महीने में मौसम का सूचक है-

लेकिन श्रावण माह में मनाये जाने वाला हरेला सामाजिक रूप से अपना विशेष महत्व रखता तथा समूचे कुमाऊँ में अति महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक माना जाता है। जिस कारण इस अन्चल में यह त्यौहार अधिक धूमधाम के साथ मनाया जाता है। जैसाकि हम सभी को विदित है कि श्रावण माह भगवान भोलेशंकर का प्रिय माह है, इसलिए हरेले के इस पर्व को कही कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि श्रावण माह शंकर भगवान जी को विशेष प्रिय है। यह तो सर्वविदित ही है कि उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शंकर का वास माना जाता है। इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण माह में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व है। दैनिक जागरण रुद्रपुर के पत्रकार मनीस पांडे ने बताया कि हरेला पर्व उत्तराखंड के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश में भी हरियाली पर्व के रूप में मनाया जाता है। हरियाली या हरेला शब्द पर्यावरण के काफी करीब है। ऐसे में इस दिन सांस्कृतिक आयोजन के साथ ही पौधारोपण भी किया जाता है। जिसमें लोग अपने परिवेश में विभिन्न प्रकार के छायादार व फलदार पौधे रोपते हैं।
सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूँ, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह को पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। घर के सदस्य इन्हें बहुत आदर के साथ अपने शीश पर रखते हैं। घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हरेला बोया व काटा जाता है! इसके मूल में यह मान्यता निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा उतनी ही फसल बढ़िया होगी! साथ ही प्रभू से फसल अच्छी होने की कामना भी की जाती है।
हरेला गीत
इस दिन कुमाऊँनी भाषा में गीत गाते हुए छोटों को आशीर्वाद दिया जाता है –
Tuesday, March 3, 2020
कुमाऊंनी होली एक परंपरा विरासत ऐतिहासिक उत्सव
कुमाऊनी होली
होली के प्रकार
इतिहास
बैठकी होली
बैठकी होली मुख्य रूप से अल्मोड़ा और नैनीताल के मुख्य बड़े नगरों में ही मनाई जाती है, इसमें होली आधारित गीत हारमोनियम और ढोलक के साथ गाए जाते हैं। पुरुष और महिलाएं एक साथ मिलकर घरों-घरों में घूम कर अथवा किसी एक जगह एकत्रित होकर होली गीतों का गायन करते हैं। कुमाऊं के प्रसिद्ध जनकवि गिरीश गिर्दा ने बैठकी होली के कई गीत लिखे हैं, बैठकी होली में मुख्य रूप से मीराबाई से लेकर नजीर और बहादुर शाह जफर के गीत गाए जाते हैं।खड़ी होली
होली त्यौहार के कुछ दिन पहले से खड़ी होली होती है। कुमाऊं क्षेत्र की खड़ी होली पूरे भारतवर्ष में चर्चित है इसका प्रसार कुमाऊं के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलता है, इसमें ग्रामीण पुरुष टोपी और कुर्ता पजामा पहन कर ढोल दमाऊ तथा हुड़के की धुनों पर गीत गाते हैं और नाचते हैं। खड़ी होली के अधिकांश गीत कुमाऊनी भाषा में होते हैं। होली गाने वाला दल जिन्हें स्थानीय भाषा में होल्यार कहा जाता है, बारी-बारी से गांव के प्रत्येक घर में जाकर होली गीत गाते हैं और उनकी समृद्धि की कामना करते हैं।

महिला होली
महिला होली में बैठकी होली की तरह गीत गाए जाते हैं, लेकिन इसमें केवल महिलाएं ही घर-घर जाकर होली गीत गाती हैं। यह कुमाऊं के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक प्रचलित है।
चीड़ बंधन
होलिका दहन के लिए कुमाऊं में छरड़ी के कुछ दिन पहले चीड़ की लकड़ियों से होलिका का निर्माण किया जाता है। जिसे चीड़ बंधन कहा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में चीड़ बंधन के बाद अपने होलिका की रक्षा अन्य गांव के लोगों से करनी पड़ती है, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित है दूसरे गांव की होलिका से चीड़ की लकड़ियां चुरा ली जाती हैं।चीड़ दहन
मुख्य होली के 1 दिन पहले रात को होलिका दहन किया जाता है, जिसे चीड़ दहन कहा जाता है, चीड़ दहन प्रहलाद की हिरण्यकश्यप के विचारों पर जीत का प्रतीक माना जाता है।
छरड़ी (छलेड़ी धुलेड़ी)
यह मुख्य होली का दिन है इस दिन गांव के लोग एक दूसरे पर रंग अबीर गुलाल लगाते हैं, पारंपरिक तौर पर टेसू के फूलों को धूप में सुखाकर पानी में घोला जाता है जिससे लाल रंग का छरड़ प्राप्त होता है, जिससे कुमाऊं क्षेत्र में होली खेली जाती है। इसीलिए कुमाऊं में होली को छरड़ी कहा जाता है
होली के अगले दिन होली टीका त्योहार मनाया जाता है इस दिन घरों में पकवान बनाए जाते हैं।
माता का ऐसा शक्ति पीठ जिसकी मूर्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा मां बाराही देवी मंदिर लोहाघाट चंपावत
माता का ऐसा शक्ति पीठ जिसकी मूर्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा मां बाराही देवी मंदिर लोहाघाट चंपावत
उत्तराखंड राज्य के चंपावत जिले में लोहाघाट नगर से 60 किलोमीटर की दूरी पर घने जंगल के मध्य स्थित देवी मां का यह मंदिर भारतवर्ष के 52 शक्तिपीठों में से एक है मां बाराही देवी शक्ति पीठ जिसे देवीधुरा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है समुद्र तल से अट्ठारह सौ 50 मीटर ब्रैकेट लगभग 5000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है![]() |
| maa barahi devi mandir |
इतिहास-
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| गुफा द्वार |

मां बाराही देवी मंदिर की पौराणिक कथा-
Friday, August 2, 2019
The Story About Garhwal Painting History प्रसिद्ध चित्रकार मौला राम Molaram
The Story About Garhwal Painting History प्रसिद्ध चित्रकार मौला राम Molaram

पारिवारिक पेशा- स्वर्णकार.
मृत्यु- 1833 (श्रीनगर गढ़वाल).
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| मालाराम जी की पेंटिंग |
पौराणिक आख्यानों पर आधारित काव्य 6
संतों पर लिखे काव्य 10।
राष्ट्रीय उद्यान संबंधी काव्य 3
नीति एवं श्रृंगार काव्य 4 हैं
माैलाराम जी द्वारा बनाए हुए कुछ चित्र


मौला राम ने गढ़वाल के 4 राजाओं के शासनकाल में कार्य किया, महाराजा प्रदीप साह (1717-1722) ललित साह (1722-1780), जयकृत शाह (1780-1785), प्रद्युमन शाह ( 1785-1804) राजाओं ने इन्हें पर्याप्त प्रोत्साहन और संरक्षण दिया। मौला राम अपने 93 वर्षीय जीवन काल के अंतिम समय में गोरखा दरबार (1804-1015) की कृपा पर भी आश्रित रहे और सन 1815-1833 तक अंग्रेजी राज को भी देखा।
Wednesday, July 24, 2019
खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Story About Anglo-Nepali War of 1814
खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Battle of Nalapani Khalanga 1814
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| खलंगा स्मारक द्वार |
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| खलंगा स्मारक |
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| शहीद बलभद्र सिंह खलंगा द्वार, नालापानी |
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| खलंगा पहाड़ी का रास्ते |
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| खूबसूरत शांत जंगल खलंगा पहाड़ी |
यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं आपको जंगल, प्रकृति, एकांत अच्छा लगता है तो यह जगह आपका इंतजार कर रही है, खूबसूरत शांत जंगलों के बीच से जाते हुए रास्ते पर अनेकों मनमोहक दृश्य हैं।
खलंगा युद्ध की कहानी-
देहरादून की खूबसूरत पहाड़ियों मेंं से एक खलंगा पहाड़ी 31 अक्टूबर 1814 में मात्र 600 गोरखा सैनिकों ने इस पहाड़ी के ऊपर खलंगा किले पर मोर्चा संभाला था। सामने थी 3500 संख्या वाली ब्रिटिश सेना। जिनके पास उस समय की आधुनिक बंदूकें और तोपे थी। गोरखा सैनिकों के पास अपनी पारंपरिक खुखरी, तलवार और धनुष बाण थे। गोरखा सैनिकों ने खुखरी के दम पर अकेले 1000 अंग्रेज सैनिकों को मार डाला।| प्राचीन खलंगा किला |
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| मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी गोरखा सेनापति बलभद्र कुंंवर |
गोरखा बटालियन की स्थापना 1815-
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| खलंगा स्मारक |
अंग्रेजों द्वारा गोरखा सैनिकों की बहादुरी का सम्मान किया गया। 1815 में इसी स्थान पर गोरखा सैनिकों की याद में युद्ध स्मारक बनाया गया। जिसे हम आज खलंगा स्मारक के नाम से जानते हैं। ब्रिटिश सेना में गोरखा बटालियन के नाम से एक बटालियन की स्थापना की गई। यह दर्शाता है कि ब्रिटिश सरकार गोरखाओं की वीरता का कितना सम्मान करती थी। गोरखा सैनिक सदैव युद्ध भूमि पर अपना साहस, शौर्य और पराक्रम दिखाते रहे हैं। गंगा पहाड़ी की तलहटी पर शहीद बलभद्र सिंह द्वार का निर्माण भारत सरकार द्वारा आजादी के बाद कराया गया है।
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| खलंगा स्मारक खलंगा स्मारक |
भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष से मानिक शाह ने कहा था- "यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मरने से डर नहीं लगता या तो वह झूठ झूठा है या फिर गोरखा है"।
इस जंगल में मोर बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं यदि आप भी देहरादून के आसपास किसी अच्छी प्राकृतिक जगह को देखना चाहते हैं तो एक बार यहां जरूर जाएं।
Saturday, July 20, 2019
कुली बेगार आंदोलन
कुली बेगार आंदोलन
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| कुली बेगार आंदोलन के दौरान जनसभा की तस्वीर |
कुली बेगार ब्रिटिश शासन काल की ऐसी व्यवस्था थी जिसमें गांव के लोगों को सरकार की सेवा में मजदूरी करने को बाध्य थे वह भी बिना किसी मालगुजारी के। गांव के पटवारी और ग्राम प्रधान को थोड़े थोड़े समय के लिए बिना किसी पारिश्रमिक के जरूरत के हिसाब से मजदूरों को अंग्रेज अफसरों के घर और दफ्तरों में मजदूरी के लिए भेजना होता था। सबका नंबर समान रूप से आए इसके लिए इनके पास रजिस्टर रहते थे सभी लोग अपनी अपनी बारी आने पर अंग्रेज अधिकारियों की सेवा में जाने को बाध्य थे। कभी-कभी शासक लोग इन मजदूरों से अत्यंत घृणित काम जैसे गंदे कपड़े धूल वाना शौचालय की सफाई करवाना आदि करवाते थे।।
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| गढ़ केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा |
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| कुर्मांचल/कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे |
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| पंडित गोविंद बल्लभ पंत |
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| हरगोविंद पंत |
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| कुली बेगार आन्दोलन के दौरान शक्ति समाचार पत्र की रिपोर्ट |
Friday, July 19, 2019
बैरिस्टर मुकुंदी लाल
शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा गांव के मिशन स्कूल में हुई। उसके बाद हाई स्कूल और इंटरमीडिएट की शिक्षा रैमजे कॉलेज अल्मोड़ा से प्रथम श्रेणी में पास की। 1911 में इलाहाबाद से स्नातक की डिग्री प्राप्त की, बाद में श्री घनानन्द खंडूरी द्वारा मिली आर्थिक मदद से इंग्लैंड जाकर 1919 में बार 8 लोग की डिग्री प्राप्त की। इंग्लैंड में शिक्षा के दौरान कई दार्शनिक एवं साहित्यकारों से मिलना जुलना हुआ इंग्लैंड में मुकुंदी लाल कई दार्शनिकों के और मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित हुए। इसी दौरान उनकी मुलाकात महात्माा गांधी से हुई।
राजनीतिक जीवन-
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में सक्रियता-
1919 में स्वदेश लौटने की बाद से ही स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए थे। इंग्लैंड में महात्मा गांधी से मुलाकात के दौरान उनके स्वदेशी विचारों से प्रभावित हुए। 1921 में समूचे उत्तराखंड में कुली बेगार आंदोलन आग की तरह फैल चुका था। मुकुंदी लाल इस आंदोलन में कूद पड़े और पूरेेेे उत्तराखंड जगह-जगह घूम घूम कर लोगोंं को इस आंदोलन सेे जोड़ा और इस आंदोलन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण निभाई। सन 1930 में बैरिस्टर मुकुंदी लाल कांग्रेस छोड़कर वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और पेशावर कांड के सिपाहियों की पैरवी के लिए एबटाबाद चले गए। जहां अपनी दमदार पर बहस से पेशावर कांड के सिपाहियों को फांसी की सजा से बचाने में कामयाब रहे। इसके बाद 1938 से 1943 तक यह टिहरी रियासत के हाई कोर्ट के जज रहे। फिर 16 साल अरपेन्टाइल फैक्ट्री बरेली के जनरल मैनेजर रहे।
अन्य-
एक लेखक, पत्रकार, संपादक, संग्रहकर्ता, दूरदर्शी के रूप में इन्होंने अपना परचम लहराया। मौलाराम के चित्रों को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मौलाराम के चित्रों के संग्रहण के ऊपर इनकी एक पुस्तक गढ़वाल पेंटिंग्स का प्रकाशन 1969 में भारत सरकार द्वारा किया गया। उत्तराखंड में मौलाराम स्कूल ऑफ आर्ट्स की स्थापना का श्रेय इन्हें ही जाता है। इन्होंने लैंसडाउन में तरुण कुमाऊं नाम से मासिक पत्रिका का संपादन और प्रकाशन किया। इसके अलावा बैरिस्टर एक कुशल शिकारी भी रहे, इन्होंने 5 शेर और 23 बाघों का शिकार किया, कोटद्वार स्थित उनके घर भारती भवन में दुर्लभ फूलों और पक्षियों का एक संग्रहालय है। बैरिस्टर ने अपने जीवन में आर्य समाजी, ईसाई, सिख, हिंदू और बौद्ध धर्म अपनाए। बुध के रूप में 10 जनवरी 1982 में निर्वाण प्राप्त हुआष बैरिस्टर मुकुंदी लाल उत्तराखंड के सच्चे सपूत थे, इनका योगदान उत्तराखंड के इतिहास में स्वर्णिम रहेगा।
























