Saturday, April 4, 2026

कोटाबाग: नैनीताल की तलहटी में छिपा एक अनछुआ स्वर्ग

 नमस्ते! कोटाबाग की खूबसूरती और वहां की शांत वादियों पर आधारित एक विस्तृत ब्लॉग यहाँ दिया गया है। इसे मैंने अलग-अलग भागों में बांटा है ताकि यह पढ़ने में रोचक और जानकारीपूर्ण लगे।

उत्तराखंड का नाम आते ही हमारे दिमाग में नैनीताल की झीलें, ऋषिकेश की गंगा आरती या मसूरी की ठंडी हवाएं घूमने लगती हैं। लेकिन देवभूमि के आंचल में कुछ ऐसी जगहें भी छिपी हैं, जहाँ तक सैलानियों का शोर अभी नहीं पहुँचा है। ऐसी ही एक जादुई जगह है— कोटाबाग

नैनीताल जिले के रामनगर डिविजन में स्थित कोटाबाग एक ऐसा गांव है, जिसे अगर 'सुकून का दूसरा नाम' कहा जाए तो गलत नहीं होगा। अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं, लेखक हैं या बस कुछ दिन अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर एकांत में बिताना चाहते हैं, तो यह ब्लॉग आपको कोटाबाग की गलियों की सैर कराएगा।


1. कोटाबाग की भौगोलिक स्थिति: पहाड़ों और मैदानों का संगम



कोटाबाग की सबसे बड़ी खासियत इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह पहाड़ियों की तलहटी (Foothills) में बसा है। एक तरफ जहाँ हिमालय की ऊंची चोटियाँ इसकी रक्षा करती हैं, वहीं दूसरी तरफ तराई के उपजाऊ मैदान इसकी गोद में फैले हैं। यह कालाढूंढगी और रामनगर के पास स्थित है, जो इसे जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के बेहद करीब बनाता है।

यहाँ का मौसम साल भर सुहावना रहता है। गर्मियों में जहाँ मैदानी इलाकों में लू चलती है, वहीं कोटाबाग की ठंडी हवाएं और पेड़ों की छाँव आपको ताजगी से भर देती है। सर्दियों में यहाँ की सुबहें कोहरे की चादर ओढ़े रहती हैं, जो किसी फिल्मी दृश्य जैसी लगती हैं।




2. 'फलों की टोकरी' और लहलहाते खेत

कोटाबाग को उत्तराखंड के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में गिना जाता है। जैसे ही आप इस कस्बे में प्रवेश करेंगे, आपका स्वागत सड़क के दोनों ओर लगे ऊंचे-ऊंचे लीची और आम के पेड़ों से होगा।

  • बागवानी: यहाँ की लीची देश-विदेश में अपनी मिठास के लिए जानी जाती है। मई और जून के महीने में जब पेड़ लाल लीचियों से लदे होते हैं, तो पूरा इलाका महक उठता है। इसके अलावा यहाँ नींबू (माल्टा), संतरा और अमरूद के भी बड़े-बड़े बाग हैं।

  • खेती: यहाँ के किसान बेहद मेहनती हैं। सीढ़ीदार खेतों के बजाय यहाँ समतल उपजाऊ जमीन है, जहाँ पीली सरसों, गेहूं और सुगंधित बासमती चावल की खेती होती है। यहाँ की हरियाली आपकी आँखों को वो सुकून देती है जो शहरों के कंक्रीट के जंगलों में नामुमकिन है।


3. पर्यटन के छिपे हुए रत्न (Hidden Attractions)

कोटाबाग सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि अनुभवों का पिटारा है। यहाँ देखने के लिए कई ऐसी जगहें हैं जो मुख्यधारा के पर्यटन मानचित्र पर भले ही न हों, लेकिन अनुभव के मामले में बेमिसाल हैं।

क. सीताबनी वन्यजीव अभयारण्य



कोटाबाग से कुछ ही दूरी पर सीताबनी का जंगल शुरू हो जाता है। यह जिम कॉर्बेट का बफर जोन है। मान्यता है कि माता सीता ने अपने वनवास का कुछ समय यहाँ बिताया था। यहाँ का प्राचीन मंदिर और शांत वातावरण अध्यात्म और रोमांच का अनोखा संगम है। यहाँ आप टाइगर, हाथी और हिरणों को उनके प्राकृतिक आवास में देख सकते हैं।


ख. बागढ़ और देवचौरी

अगर आपको ट्रैकिंग और बर्ड वाचिंग (पक्षियों को देखना) पसंद है, तो बागढ़ आपके लिए जन्नत है। यहाँ से आप पहाड़ों की ऊंचाई का लुत्फ उठा सकते हैं और दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों को देख सकते हैं। देवचौरी का रास्ता घने जंगलों से होकर गुजरता है, जहाँ प्रकृति अपनी पूरी भव्यता के साथ मौजूद है।

ग. कलुआपानी और जलप्रपात

कोटाबाग के आस-पास कई छोटे-छोटे झरने और नदियाँ बहती हैं। पहाड़ी गधेरे (छोटी नदियाँ) का ठंडा पानी और पत्थरों से टकराती उनकी आवाज किसी संगीत से कम नहीं लगती। पिकनिक मनाने के लिए ये बेहतरीन जगहें हैं।


4. पहाड़ी संस्कृति और खान-पान

कोटाबाग की असली आत्मा यहाँ के लोगों और उनके सरल जीवन में बसती है। यहाँ के लोग 'अतिथि देवो भव:' की परंपरा को आज भी जीवंत रखे हुए हैं।

  • पारंपरिक भोजन: अगर आप कोटाबाग में हैं, तो यहाँ का पारंपरिक पहाड़ी खाना जरूर चखें। पहाड़ी झोली (कढ़ी), भाट की चुड़कानी, और गहत की दाल का स्वाद आप कभी नहीं भूल पाएंगे। यहाँ के ताजे पिसे हुए 'नमक' (पिस्नू लूण) के साथ स्थानीय फलों का आनंद लेना एक अलग ही अनुभव है।

  • त्योहार: यहाँ कुमाऊँनी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। घुघुतिया, हरेला और जागर जैसे त्योहार यहाँ बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं, जो आपको यहाँ की जड़ों से जोड़ते हैं।


5. कोटाबाग क्यों आएं? (The Slow Life Experience)

आजकल की भागदौड़ में हम 'स्लो लिविंग' को भूल गए हैं। कोटाबाग आपको सिखाता है कि बिना शोर-शराबे के भी जिंदगी कितनी खूबसूरत हो सकती है।

  1. डिजिटल डिटॉक्स: यहाँ के कई होमस्टे ऐसी जगहों पर हैं जहाँ नेटवर्क भले ही कम हो, लेकिन अपनों के साथ जुड़ने का मौका पूरा मिलता है।

  2. फोटोग्राफी: अगर आप फोटोग्राफर हैं, तो यहाँ के लैंडस्केप, पक्षी और ग्रामीण जीवन आपको हजारों बेहतरीन शॉट्स देंगे।



  3. लेखन और कला: यहाँ की शांति लेखकों और कलाकारों को नई प्रेरणा देती है।


6. कैसे पहुँचें और कहाँ रुकें?

कैसे पहुँचें:

  • हवाई मार्ग: नजदीकी हवाई अड्डा पंतनगर है, जो यहाँ से लगभग 70-80 किमी दूर है।



  • रेल मार्ग: रामनगर या हल्द्वानी/काठगोदाम नजदीकी रेलवे स्टेशन हैं। वहां से आप टैक्सी या बस लेकर आसानी से कोटाबाग पहुँच सकते हैं।

  • सड़क मार्ग: दिल्ली से इसकी दूरी लगभग 260 किमी है। आप नैनीताल या रामनगर जाने वाली बस से कालाढूंढगी पहुँच सकते हैं और वहां से कोटाबाग के लिए स्थानीय वाहन मिल जाते हैं।



कहाँ रुकें: कोटाबाग में अब कई शानदार इको-रिसॉर्ट्स और होमस्टे खुल गए हैं। यहाँ रुकने का सबसे अच्छा तरीका होमस्टे है, ताकि आप स्थानीय लोगों के साथ रहकर उनके जीवन को समझ सकें।


निष्कर्ष

कोटाबाग उन लोगों के लिए एक वरदान है जो प्रकृति की गोद में सिर रखकर कुछ पल सुस्ताना चाहते हैं। यह जगह आपको दिखाती है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है। अगली बार जब आप उत्तराखंड की यात्रा का प्लान बनाएं, तो नैनीताल की भीड़ से हटकर कोटाबाग की इन हसीन वादियों में जरूर कदम रखें।

यकीन मानिए, कोटाबाग की मिट्टी की सोंधी खुशबू और यहाँ के लोगों की मुस्कान आपके दिल में हमेशा के लिए बस जाएगी।


क्या आप कोटाबाग की यात्रा के बारे में सोच रहे हैं? या आप वहां के किसी खास अनुभव को साझा करना चाहते हैं? हमें कमेंट्स में जरूर बताएं!

Tuesday, October 11, 2022

खतड़वा: एक त्योहार और कुमाऊं का वीर सैनिक

 कुमाऊं का लोक पर्व त्योहार खतड़ुवा-


    उत्तराखंड कुमाऊं का लोक पर्व त्योहार खतड़ुवा पशुओं की रक्षा और खुशहाली हेतु मनाया जाता हैं। खतडुवा, खतरूवा या फिर खतड़वा त्यौहार आश्विन मास (ये लगभग सितम्बर 15 को अक्टूबर 15 के मध्य होता है) की संक्रांति के दिन उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल के लोग खतडुवा (Khatduwa festival) लोक पर्व मनाते हैं। अश्विन संक्रांति को कन्या संक्रांति भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन भगवान सूर्यदेव सिंह राशि की यात्रा समाप्त कर कन्या राशि मे प्रवेश करते हैं।

कुमाऊँ में प्रचारित खतड़ुवा की लोककथाओं के अनुसार-

कुमाऊं का लोक पर्व त्यौहार खतड़वा यह त्योहार विजयोल्लास का प्रतीक है। सोलवीं सदी में जब चंद राज्य एवं पंवार राज्य की सेनाओं के बीच 8 बार भयंकर युद्ध हुआ । प्रारंभ के 7 युद्ध में चंद सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा परंतु आठवीं बार चंद सेना द्वारा पुनः आक्रमण किया गया इस युद्ध का नेतृत्व चंद्र सेनापति गैंडा कर रहा था तथा पंवार सेना का सेनापति खतड़वा था। चंद सेना को विजय प्राप्ति हुई। इस वजह से चंद्रसेना को प्रचुर मात्रा में धन की प्राप्ति हुई। लगातार 7 बार पराजय के बाद जीत प्राप्त हुई। इस विजय से चंद राजा की प्रशंसा की कोई सीमा नहीं रही। इस विजय की स्मृति में खतड़वा त्योहार की रखी गई। इसी कथा के अनुसार लोग गलत समझते है, जबकि यह सब मनघडंत कथाएं हैं।

ऐसा हो सकता है, कि पहले जमाने मे संचार के साधन नही थे, उस समय ऊँची ऊँची चोटियों पर आग जला कर संदेश प्रसारित किए जाते थे। संयोगवश अश्विन संक्रांति किसी राजा की विजय हुई हो या ऊँची चोटियों पर आग जला के संदेश पहुचाया हो, और लोगो ने इसे खतड़वा त्यौहार के साथ जोड़ दिया। जबकि खतड़वा त्यौहार पशुओं की रोगों से रक्षा और खुशहाली के लिए मानते हैं।

Tuesday, July 27, 2021

हरेला प्रकृति के साथ रिश्तो का पर्व

 हरेला मूल रूप से उत्तराखण्ड  के कुमाऊँ क्षेत्र में मनाया जाता है। हरेला पर्व 1 साल में तीन बार मनाया जाता है..........

1. पहली बार चैत्र महीने में पहले दिन बोया जाता है और नवमी के दिन काटा जाता है।

2. दूसरा सावन के महीने में सावन लगने के 9 दिन पहले आषाढ़ में बोया जाता है और सावन महीने के पहले दिन काट दिया जाता है।

3. तीसरा अश्विन माह में नवरात्र के पहले दिन बुरा जाता है और दशहरे के दिन काट दिया जाता है।

चैत्र और आश्विन महीने में मौसम का सूचक है-



    लेकिन श्रावण माह में मनाये जाने वाला हरेला सामाजिक रूप से अपना विशेष महत्व रखता तथा समूचे कुमाऊँ में अति महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक माना जाता है। जिस कारण इस अन्चल में यह त्यौहार अधिक धूमधाम के साथ मनाया जाता है। जैसाकि हम सभी को विदित है कि श्रावण माह भगवान भोलेशंकर का प्रिय माह है, इसलिए हरेले के इस पर्व को कही कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि श्रावण माह शंकर भगवान जी को विशेष प्रिय है। यह तो सर्वविदित ही है कि उत्तराखण्ड एक पहाड़ी प्रदेश है और पहाड़ों पर ही भगवान शंकर का वास माना जाता है। इसलिए भी उत्तराखण्ड में श्रावण माह में पड़ने वाले हरेला का अधिक महत्व है। दैनिक जागरण रुद्रपुर के पत्रकार मनीस पांडे ने बताया कि हरेला पर्व उत्तराखंड के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश में भी हरियाली पर्व के रूप में मनाया जाता है। हरियाली या हरेला शब्द पर्यावरण के काफी करीब है। ऐसे में इस दिन सांस्कृतिक आयोजन के साथ ही पौधारोपण भी किया जाता है। जिसमें लोग अपने परिवेश में विभिन्न प्रकार के छायादार व फलदार पौधे रोपते हैं।

    सावन लगने से नौ दिन पहले आषाढ़ में हरेला बोने के लिए किसी थालीनुमा पात्र या टोकरी का चयन किया जाता है। इसमें मिट्टी डालकर गेहूँ, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि 5 या 7 प्रकार के बीजों को बो दिया जाता है। नौ दिनों तक इस पात्र में रोज सुबह को पानी छिड़कते रहते हैं। दसवें दिन इसे काटा जाता है। 4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को ही हरेला कहा जाता है। घर के सदस्य इन्हें बहुत आदर के साथ अपने शीश पर रखते हैं। घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हरेला बोया व काटा जाता है! इसके मूल में यह मान्यता निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा उतनी ही फसल बढ़िया होगी! साथ ही प्रभू से फसल अच्छी होने की कामना भी की जाती है।



हरेला गीत

इस दिन कुमाऊँनी भाषा में गीत गाते हुए छोटों को आशीर्वाद दिया जाता है –

जी रये, जागि रये, तिष्टिये, पनपिये,
दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइये,
हिमाल में ह्यूं छन तक,
गंग ज्यू में पांणि छन तक,
यो दिन और यो मास भेटनैं रये,
अगासाक चार उकाव, धरती चार चकाव है जये,
स्याव कस बुद्धि हो, स्यू जस पराण हो।”

Tuesday, March 3, 2020

कुमाऊंनी होली एक परंपरा विरासत ऐतिहासिक उत्सव

 कुमाऊनी होली

 उत्तराखंड राज्य में कुमाऊं क्षेत्र में होली का त्यौहार एक अलग अंदाज में मनाया जाता है। कुमाऊं क्षेत्र में होली का अलग ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। पहाड़ी क्षेत्रों में इस समय सर्दी के मौसम का अंत होता है और नई फसल की बुवाई का समय होता है। कुमाऊं क्षेत्र में होली का त्योहार बसंत पंचमी के दिन शुरू हो जाता है ।


होली  के प्रकार

कुमाऊं में होली तीन प्रकार से मनाई जाती है - 1. बैठकी होली 2. खड़ी होली 3. महिला होली यहां होली में केवल अबीर गुलाल का टीका ही नहीं लगता, वरन बैठकी होली और संगीत गायन की परंपरा का भी विशेष महत्व है।

 इतिहास

 कुमाऊनी होली का आरंभ मुख्य रूप से 15 वी शताब्दी में चंपावत और इसके आसपास के क्षेत्र में  चंद राजाओं के शासनकाल में हुई चंद राजवंश के प्रसार के साथ-साथ यह परंपरा संपूर्ण कुमाऊं क्षेत्र में फैल गई।

 बैठकी होली

 बैठकी होली मुख्य रूप से अल्मोड़ा और नैनीताल के मुख्य बड़े नगरों में ही मनाई जाती है, इसमें होली आधारित गीत हारमोनियम और ढोलक के साथ गाए जाते हैं। पुरुष और महिलाएं एक साथ मिलकर घरों-घरों में घूम कर अथवा किसी एक जगह एकत्रित होकर होली गीतों का गायन करते हैं। कुमाऊं के प्रसिद्ध जनकवि गिरीश गिर्दा ने बैठकी होली के कई गीत लिखे हैं, बैठकी होली में मुख्य रूप से मीराबाई से लेकर नजीर और बहादुर शाह जफर के गीत गाए जाते हैं।


 खड़ी होली 

होली त्यौहार के कुछ दिन पहले से खड़ी होली होती है।  कुमाऊं क्षेत्र की खड़ी होली पूरे भारतवर्ष में चर्चित है इसका प्रसार कुमाऊं के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलता है, इसमें ग्रामीण पुरुष टोपी और कुर्ता पजामा पहन कर ढोल दमाऊ तथा हुड़के की धुनों पर गीत गाते हैं और नाचते हैं। खड़ी होली के अधिकांश गीत कुमाऊनी भाषा में  होते हैं। होली गाने वाला दल जिन्हें स्थानीय भाषा में होल्यार कहा जाता है, बारी-बारी से गांव के प्रत्येक घर में जाकर होली गीत गाते हैं और उनकी समृद्धि की कामना करते हैं।



 महिला होली 

महिला होली में बैठकी होली की तरह गीत गाए जाते हैं, लेकिन इसमें केवल महिलाएं ही घर-घर जाकर होली गीत गाती हैं। यह कुमाऊं के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक प्रचलित है।


 चीड़ बंधन 

होलिका दहन के लिए कुमाऊं में छरड़ी के कुछ दिन पहले चीड़ की लकड़ियों से होलिका का निर्माण किया जाता है। जिसे चीड़ बंधन कहा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में चीड़ बंधन के बाद अपने होलिका की रक्षा अन्य गांव के लोगों से करनी पड़ती है, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित है दूसरे गांव की होलिका से चीड़ की लकड़ियां चुरा ली जाती हैं।

 चीड़ दहन 

 मुख्य होली के 1 दिन पहले रात को होलिका दहन किया जाता है, जिसे चीड़ दहन कहा जाता है, चीड़ दहन प्रहलाद की हिरण्यकश्यप के विचारों पर जीत का प्रतीक माना जाता है।


 छरड़ी  (छलेड़ी  धुलेड़ी)

   यह मुख्य होली का दिन है इस दिन गांव के लोग एक दूसरे पर रंग अबीर गुलाल लगाते हैं,  पारंपरिक तौर पर टेसू के फूलों को धूप में सुखाकर पानी में घोला जाता है जिससे लाल रंग का छरड़ प्राप्त होता है, जिससे कुमाऊं क्षेत्र में होली खेली जाती है। इसीलिए कुमाऊं में होली को छरड़ी कहा जाता है


 होली के अगले दिन होली टीका त्योहार मनाया जाता है इस दिन घरों में पकवान बनाए जाते हैं।

माता का ऐसा शक्ति पीठ जिसकी मूर्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा मां बाराही देवी मंदिर लोहाघाट चंपावत


माता का ऐसा शक्ति पीठ जिसकी मूर्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा मां बाराही देवी मंदिर लोहाघाट चंपावत

 उत्तराखंड राज्य के चंपावत जिले में लोहाघाट नगर से 60 किलोमीटर की दूरी पर घने जंगल के मध्य स्थित देवी मां का यह मंदिर भारतवर्ष के 52 शक्तिपीठों में से एक है मां बाराही देवी शक्ति पीठ जिसे देवीधुरा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है समुद्र तल से अट्ठारह सौ 50 मीटर ब्रैकेट लगभग 5000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है
maa barahi devi mandir 

 इतिहास-

    उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में चंद्र राजाओं के शासनकाल में मां चंपा देवी और ललित जिह्वा मां काली की स्थापना की गई। लाल जीभ वाली महाकाली को महर और फर्त्याल जाति के लोगों द्वारा प्रतिवर्ष बारी-बारी से नर बलि दी जाती थी कालांतर में रोहेलो के आक्रमण के समय कत्यूरी राजाओं द्वारा मां बाराही की मूर्ति को घने जंगल के मध्य एक गुफा में स्थापित कर दिया गया था। वर्तमान में इसके चारों ओर गांव बस गया है मां बाराही मंदिर के आसपास कई छोटे-बड़े ग्रेनाइट के शिलाखंड फैले हैं, जिनके बारे में बताया जाता है कि भीम द्वारा बाल क्रीड़ा के दौरान या पत्थर फेंके गए थे। कुछ  शिला खंडों पर अभी भी उंगलियों के निशान दिखाई देते हैं मंदिर के निकट दो विशाल पत्थर हैं जिनमें से एक का नाम रामशिला है इस स्थान पर पचीसी नामक जुए के चिन्ह आज भी  विद्यमान है।
गुफा द्वार

                                                      

मां बाराही देवी मंदिर की पौराणिक कथा-

 ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार इस स्थान पर गुह्य काली की उपासना का केंद्र था। इस स्थान पर काली को प्रसन्न करने के लिए वालिक, लमगड़िया, चम्याल गहडवाल खामों के महर एवं फर्त्याल जाति के लोगों द्वारा प्रतिवर्ष बारी-बारी से नर बलि दी जाती थी। मान्यताओं के अनुसार एक बुजुर्ग की तपस्या से प्रसन्न होने के बाद नर बलि की प्रथा को बंद कर दिया गया। यहां स्थापित देवी मां की मूर्ति को तांबे की पेटी में रखा गया है जिससे जिसे आज तक किसी व्यक्ति ने खुली आंखों से नहीं देखा गया है ऐसा माना जाता है कि देवी मां की मूर्ति को खुली आंखों से देखने पर उसके तेज से इतनी रोशनी निकलती है कि व्यक्ति अंधा हो जाता है।



बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) 

सावन माह में रक्षाबंधन के दिन देवी मां की मूर्ति का श्रंगार पुजारियों द्वारा आंखों में काली पट्टी बांधकर किया जाता है रक्षाबंधन के दिन प्रतिवर्ष 4 खामों द्वारा बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) का आयोजन किया जाता है इस युद्ध के दौरान एक व्यक्ति के शरीर जितना रक्त बहने तक पत्थरों से युद्ध किया जाता है वर्तमान में प्रशासन द्वारा युद्ध केवल फूल और फलों द्वारा आयोजित करवाया जाता है।

Friday, August 2, 2019

The Story About Garhwal Painting History प्रसिद्ध चित्रकार मौला राम Molaram

The Story About Garhwal Painting History  प्रसिद्ध चित्रकार  मौला राम Molaram  



 नाम- मौला राम तोमर. 
 जन्म- 1743,  (श्रीनगर गढ़वाल).
 पिता- मंगतराम.  
 माता- रमा देवी.
 पेशा-  चित्रकार  साहित्यकार इतिहासकार राजनीतिज्ञ.
 पारिवारिक पेशा- स्वर्णकार.
 मृत्यु- 1833  (श्रीनगर गढ़वाल).




        उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में चित्रकला की एक अनूठी शैली है, जो कई सदियों से चली आ रही है। विख्यात चित्रकारों में एक नाम #मौला राम का है। माई 1658 में दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह, औरंगजेब के डर से भाग कर गढ़वाल नरेश की शरण में आ गए। तब वह अपने साथ 2 चित्रकारों को भी लाए कुंवर श्यामदास और उनके पुत्र हरदास के पुत्र हीरालाल हुए और हीरालाल के पुत्र मंगतराम हुए मंगत राम के पुत्र मौला राम हुए मौला राम के पुरखों ने गढ़वाल चित्रकला को संरक्षण और संवर्धन दिया।
        मौला राम दिल्ली के प्रसिद्ध चित्रकार श्याम दास की पांचवी पीढ़ी में जन्मे थे। इनका जन्म श्रीनगर गढ़वाल में हुआ। इनके पिता मंगतराम और माता रमा देवी पैसे से स्वर्णकार थे, इन्होंने अपने पिता से स्वर्ण कला के साथ-साथ चित्र कला भी सीखी। मौलाराम की कलाकृतियां आज भी हमारे गौरवशाली इतिहास की समृद्धि को  पुष्ट कर रही हैं। इनके चित्रों में हिमालय की छटा गढ़वाली पशु-पक्षियों और वृक्षों की शोभा तथा नदियों की पवित्रता का चित्रण है। अमेरिका के प्रसिद्ध बोस्टन संग्रहालय में मौला राम के उत्कृष्ट कला चित्र आज भी शोभा बढ़ा रहे हैं। इससे पूर्व 1947 में इनकी चित्रकला को विश्व चित्रकला प्रदर्शनी में लंदन में दिखाया जा चुका है। मौला राम को वर्तमान समय में प्रकाश में लाने का मुख्य श्रेय बैरिस्टर मुकुंदी लाल को जाता है। मुकुंदी लाल ने सन 1968 में इनके जीवन के ऊपर एक पुस्तक गढ़वाल पेंटिंग्स लिखी, जिसे 1969 में भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित किया गया।

मालाराम जी की पेंटिंग
        चित्रकार के साथ-साथ मौला राम अपने कालखंड के श्रेष्ठ साहित्यकार, इतिहासकार, कुशल राजनीतिज्ञ भी रहे हैं। मौला राम संतों, नाथों और सिद्धों से बहुत प्रभावित थे। उनका एक काव्य मन्मथ पंथ यही सिद्ध करता है। मौला राम के 7 हस्तलिखित काव्य भी प्राप्त हुए हैं। गढ़ राजवंश इनकी सबसे प्रसिद्ध रचना है। उत्तराखंड के मूर्धन्य इतिहासकार डॉ शिव प्रकाश डबराल 'चारण' की खोज के अनुसार मौला राम के अब तक 35 हिंदी काव्य खोजे जा चुके हैं। 
ऐतिहासिक कथाओं पर आधारित काव्य 12 है।
पौराणिक आख्यानों पर आधारित काव्य 6
संतों पर लिखे काव्य 10।
राष्ट्रीय उद्यान संबंधी काव्य 3
नीति एवं श्रृंगार काव्य 4 हैं

माैलाराम जी द्वारा बनाए हुए कुछ चित्र

 





      मौला राम ने गढ़वाल के 4 राजाओं के शासनकाल में कार्य किया, महाराजा प्रदीप साह (1717-1722)  ललित साह (1722-1780), जयकृत शाह (1780-1785),  प्रद्युमन शाह ( 1785-1804) राजाओं ने इन्हें पर्याप्त प्रोत्साहन और संरक्षण दिया। मौला राम अपने 93 वर्षीय जीवन काल के अंतिम समय में गोरखा दरबार (1804-1015) की कृपा पर भी आश्रित रहे और सन 1815-1833 तक अंग्रेजी राज को भी देखा।
         मौला राम के बनाए गए चित्रों को  मौला राम आर्ट गैलरी, श्रीनगर गढ़वाल, ब्रिटेन के संग्रहालय, बोस्टन संग्रहालय अमेरिका, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के संग्रहालय, भारत कला भवन, बनारस, अहमदाबाद, के संग्रहालय और लखनऊ, दिल्ली, कोलकाता तथा इलाहाबाद की आर्ट गैलरी में देखे जा सकते हैं।

         मौला राम की कला और साहित्य को प्रचार-प्रसार और संवर्धन की नितांत आवश्यकता है ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी समृद्ध कला से प्रेरणा लेकर भारतीय संस्कृति को सम्पुष्ट कर सके। भारतीय संस्कृति उस समय की चित्रकला पद्धति और प्रगति सामान्य साहित्य सरलता तथा सौंदर्य को परिलक्षित करती है तत्कालीन चित्रकला में अतीत की गंभीरता और शनै-शनै आगे बढ़ती 18 वीं सदी की प्रचुर रमणीयता पाई जाती है। सांसारिक और असांसारिक विषयों को रंगों में बांधा गया है।

Wednesday, July 24, 2019

खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Story About Anglo-Nepali War of 1814

 खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Battle of Nalapani Khalanga 1814






खलंगा स्मारक द्वार
खलंगा स्मारक
deepak badhani
 शहीद बलभद्र सिंह खलंगा द्वार,  नालापानी 
           गोरखा सैनिक हमेशा से अपने शौर्य और पराक्रम के लिए जाने जाते रहे हैं। इतिहास की अनेकों गाथाएं इनकी वीरता का गुणगान करती हैं। गोरखाओं की वीरता ही है कि नेपाल देश आज तक कभी किसी बाहरी शक्ति का गुलाम नहीं हुआ। इतिहास में अनेकों बार नेपाल पर बाहरी आक्रमण हुए परंतु गोरखाओं ने अपनी एकजुटता और पराक्रम से नेपाल को हमेशा से एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाए रखा है। ऐसी ही एक कहानी है देहरादून के नालापानी के पास खलंगा पहाड़ी की-

deepak badhani
खलंगा पहाड़ी का रास्ते
 कैसे पहुंचे-
deepak badhani
खूबसूरत शांत जंगल खलंगा पहाड़ी 
          देहरादून में रायपुर के पास नालापानी नाम का छोटा सा गांव है, जहां से खलंगा स्मारक की दूरी मात्र 4 किलोमीटर है। नालापानी देहरादून शहर से 10 किलोमीटर दूर है, आप यहां किसी भी मौसम में आ सकते हैं। प्रतिवर्ष नवंबर माह में यहां गोरखा समुदाय द्वारा मेले का आयोजन किया जाता है।
यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं आपको जंगल, प्रकृति,  एकांत अच्छा लगता है तो यह जगह आपका इंतजार कर रही है, खूबसूरत शांत जंगलों के बीच से जाते हुए रास्ते पर अनेकों मनमोहक दृश्य हैं।

खलंगा युद्ध की कहानी-

             देहरादून की खूबसूरत पहाड़ियों मेंं से एक खलंगा पहाड़ी 31 अक्टूबर 1814 में मात्र 600 गोरखा सैनिकों ने इस पहाड़ी के ऊपर खलंगा किले पर मोर्चा संभाला था। सामने थी 3500 संख्या वाली ब्रिटिश सेना। जिनके पास उस समय की आधुनिक बंदूकें और तोपे थी। गोरखा सैनिकों के पास अपनी पारंपरिक खुखरी, तलवार और धनुष बाण थे। गोरखा सैनिकों ने खुखरी के दम पर अकेले 1000 अंग्रेज सैनिकों को मार डाला।

प्राचीन खलंगा किला
इस लड़ाई में कई अंग्रेज अफसर भी मारे गए, जिनमें मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी भी थे। इस युद्ध में गोरखा सेना का नेतृत्व कर रहे बलभद्र कुंंवर भी शहीद हो गए। ब्रिटिश सेना द्वारा कलिंगा किले का पानी रोक दिया गया। जिस कारण बलभद्र कुंंवर अपने ६० सैनिकों के साथ किले से बाहर आ गए और अंग्रेजों से युद्ध किया अंग्रेजों द्वारा उन्हें मरा हुआ घोषित कर दिया गया। परंतु कुछ लोगों का मानना है कि बलभद्र कुंवर वहां से भाग गए थे और अफगानिस्तान में सैनिक के रूप में 1835 में युद्ध में शहीद हुए।

deepak badhani                               
मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी                                                                              गोरखा  सेनापति बलभद्र कुंंवर                                                        




 गोरखा बटालियन की स्थापना 1815-



deepak badhani
खलंगा स्मारक 

        अंग्रेजों द्वारा गोरखा सैनिकों की बहादुरी का सम्मान किया गया। 1815 में इसी स्थान पर गोरखा सैनिकों की याद में युद्ध स्मारक बनाया गया। जिसे हम आज खलंगा स्मारक के नाम से जानते हैं। ब्रिटिश सेना में गोरखा बटालियन के नाम से एक बटालियन की स्थापना की गई। यह दर्शाता है कि ब्रिटिश सरकार गोरखाओं की वीरता का कितना सम्मान करती थी। गोरखा सैनिक सदैव युद्ध भूमि पर अपना साहस, शौर्य और पराक्रम दिखाते रहे हैं। गंगा पहाड़ी की तलहटी पर शहीद बलभद्र सिंह द्वार का निर्माण भारत सरकार द्वारा आजादी के बाद कराया गया है।
                     खलंगा स्मारक                                                                        खलंगा स्मारक  



                  भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष से मानिक शाह ने कहा था- "यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मरने से डर नहीं लगता या तो वह झूठ झूठा है या फिर गोरखा है"।
                 इस जंगल में मोर बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं यदि आप भी देहरादून के आसपास किसी अच्छी प्राकृतिक जगह को देखना चाहते हैं तो एक बार यहां जरूर जाएं।


Saturday, July 20, 2019

कुली बेगार आंदोलन

कुली बेगार आंदोलन

कुली बेगार आंदोलन के दौरान जनसभा की तस्वीर

कुली बेगार ब्रिटिश शासन काल की  ऐसी व्यवस्था थी  जिसमें  गांव  के लोगों को  सरकार की सेवा में मजदूरी करने को बाध्य थे  वह भी बिना किसी मालगुजारी  के।   गांव के पटवारी और ग्राम प्रधान को थोड़े थोड़े समय के लिए बिना किसी पारिश्रमिक के जरूरत के हिसाब से मजदूरों को अंग्रेज अफसरों के घर और दफ्तरों में मजदूरी के लिए भेजना होता था।  सबका नंबर समान रूप से आए इसके लिए इनके पास रजिस्टर रहते थे सभी लोग अपनी अपनी बारी आने पर अंग्रेज अधिकारियों की सेवा में जाने को बाध्य थे। कभी-कभी शासक लोग इन मजदूरों से अत्यंत घृणित काम जैसे गंदे कपड़े धूल वाना शौचालय की सफाई करवाना आदि करवाते थे।।
 गढ़ केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा
कुर्मांचल/कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे


       सन 1913 में कुली बेगार यहां के निवासियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया।  धीरे-धीरे इस प्रथा के खिलाफ पर्वतीय लोगों में असंतोष व्याप्त हो गया।  बद्री दत्त पांडे ने अल्मोड़ा अखबार के माध्यम से कुली बेगार के खिलाफ लोगों को जागरूक करने का काम किया।  14 जनवरी 1921 को मकर सक्रांति के दिन बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में श्री बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में लगभग 40000 लोगों की एक विशाल जनसभा हुई।। जिसमें यह निश्चित किया गया कि कुली बेगार कुली उतार अब सहन नहीं किया जाएगा।  विशाल जनसमूह ने भगवान बागनाथ की पूजा कर गोमती और सरयू के जल से भगवान बागनाथ की सौगंध खाकर प्रधानों और पटवारियों से मजदूरी के रजिस्टर लेकर गोमती और सरयू संगम में प्रवाहित कर दिए।   जिसके बाद यह विद्रोह पूरे राज्य में फैल गया.. गढ़वाल में इस आंदोलन को अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने धार दी।   कुली बेगार प्रथा समाप्त होने के बाद बद्री दत्त पांडे को कुमाऊं केसरी और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा को गढ़ केसरी का खिताब दिया गया।


पंडित गोविंद बल्लभ पंत
 हरगोविंद पंत 
       महात्मा गांधी ने इस आंदोलन को के बारे में यंग इंडिया में लिखा इसका प्रभाव संपूर्ण था यह एक रक्तहीन क्रांति थी।  जिसके बाद महात्मा गांधी ने खुद बागेश्वर और चनौंदा  में गांधी आश्रम बनवाया इस आंदोलन में पंडित गोविंद बल्लभ पंत, विक्टर मोहन जोशी, हरगोविंद पंत, श्याम लाल शाह, लाला चिरंजीलाल, बैरिस्टर मुकुंदी लाल, आदि अनेकों नेताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। संभवतः 1857 की क्रांति के बाद यह एक प्रमुख आंदोलन रहा, जिसके द्वारा अंग्रेजों को यह एहसास हुआ कि पर्वतीय लोग उनके अत्याचारों से कितने कुंठित हैं।
कुली बेगार आन्दोलन के दौरान शक्ति समाचार पत्र की रिपोर्ट