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कोटाबाग: नैनीताल की तलहटी में छिपा एक अनछुआ स्वर्ग

 नमस्ते! कोटाबाग की खूबसूरती और वहां की शांत वादियों पर आधारित एक विस्तृत ब्लॉग यहाँ दिया गया है। इसे मैंने अलग-अलग भागों में बांटा है ताकि यह पढ़ने में रोचक और जानकारीपूर्ण लगे।

उत्तराखंड का नाम आते ही हमारे दिमाग में नैनीताल की झीलें, ऋषिकेश की गंगा आरती या मसूरी की ठंडी हवाएं घूमने लगती हैं। लेकिन देवभूमि के आंचल में कुछ ऐसी जगहें भी छिपी हैं, जहाँ तक सैलानियों का शोर अभी नहीं पहुँचा है। ऐसी ही एक जादुई जगह है— कोटाबाग

नैनीताल जिले के रामनगर डिविजन में स्थित कोटाबाग एक ऐसा गांव है, जिसे अगर 'सुकून का दूसरा नाम' कहा जाए तो गलत नहीं होगा। अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं, लेखक हैं या बस कुछ दिन अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर एकांत में बिताना चाहते हैं, तो यह ब्लॉग आपको कोटाबाग की गलियों की सैर कराएगा।


1. कोटाबाग की भौगोलिक स्थिति: पहाड़ों और मैदानों का संगम



कोटाबाग की सबसे बड़ी खासियत इसकी भौगोलिक स्थिति है। यह पहाड़ियों की तलहटी (Foothills) में बसा है। एक तरफ जहाँ हिमालय की ऊंची चोटियाँ इसकी रक्षा करती हैं, वहीं दूसरी तरफ तराई के उपजाऊ मैदान इसकी गोद में फैले हैं। यह कालाढूंढगी और रामनगर के पास स्थित है, जो इसे जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के बेहद करीब बनाता है।

यहाँ का मौसम साल भर सुहावना रहता है। गर्मियों में जहाँ मैदानी इलाकों में लू चलती है, वहीं कोटाबाग की ठंडी हवाएं और पेड़ों की छाँव आपको ताजगी से भर देती है। सर्दियों में यहाँ की सुबहें कोहरे की चादर ओढ़े रहती हैं, जो किसी फिल्मी दृश्य जैसी लगती हैं।




2. 'फलों की टोकरी' और लहलहाते खेत

कोटाबाग को उत्तराखंड के सबसे उपजाऊ क्षेत्रों में गिना जाता है। जैसे ही आप इस कस्बे में प्रवेश करेंगे, आपका स्वागत सड़क के दोनों ओर लगे ऊंचे-ऊंचे लीची और आम के पेड़ों से होगा।

  • बागवानी: यहाँ की लीची देश-विदेश में अपनी मिठास के लिए जानी जाती है। मई और जून के महीने में जब पेड़ लाल लीचियों से लदे होते हैं, तो पूरा इलाका महक उठता है। इसके अलावा यहाँ नींबू (माल्टा), संतरा और अमरूद के भी बड़े-बड़े बाग हैं।

  • खेती: यहाँ के किसान बेहद मेहनती हैं। सीढ़ीदार खेतों के बजाय यहाँ समतल उपजाऊ जमीन है, जहाँ पीली सरसों, गेहूं और सुगंधित बासमती चावल की खेती होती है। यहाँ की हरियाली आपकी आँखों को वो सुकून देती है जो शहरों के कंक्रीट के जंगलों में नामुमकिन है।


3. पर्यटन के छिपे हुए रत्न (Hidden Attractions)

कोटाबाग सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि अनुभवों का पिटारा है। यहाँ देखने के लिए कई ऐसी जगहें हैं जो मुख्यधारा के पर्यटन मानचित्र पर भले ही न हों, लेकिन अनुभव के मामले में बेमिसाल हैं।

क. सीताबनी वन्यजीव अभयारण्य



कोटाबाग से कुछ ही दूरी पर सीताबनी का जंगल शुरू हो जाता है। यह जिम कॉर्बेट का बफर जोन है। मान्यता है कि माता सीता ने अपने वनवास का कुछ समय यहाँ बिताया था। यहाँ का प्राचीन मंदिर और शांत वातावरण अध्यात्म और रोमांच का अनोखा संगम है। यहाँ आप टाइगर, हाथी और हिरणों को उनके प्राकृतिक आवास में देख सकते हैं।


ख. बागढ़ और देवचौरी

अगर आपको ट्रैकिंग और बर्ड वाचिंग (पक्षियों को देखना) पसंद है, तो बागढ़ आपके लिए जन्नत है। यहाँ से आप पहाड़ों की ऊंचाई का लुत्फ उठा सकते हैं और दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों को देख सकते हैं। देवचौरी का रास्ता घने जंगलों से होकर गुजरता है, जहाँ प्रकृति अपनी पूरी भव्यता के साथ मौजूद है।

ग. कलुआपानी और जलप्रपात

कोटाबाग के आस-पास कई छोटे-छोटे झरने और नदियाँ बहती हैं। पहाड़ी गधेरे (छोटी नदियाँ) का ठंडा पानी और पत्थरों से टकराती उनकी आवाज किसी संगीत से कम नहीं लगती। पिकनिक मनाने के लिए ये बेहतरीन जगहें हैं।


4. पहाड़ी संस्कृति और खान-पान

कोटाबाग की असली आत्मा यहाँ के लोगों और उनके सरल जीवन में बसती है। यहाँ के लोग 'अतिथि देवो भव:' की परंपरा को आज भी जीवंत रखे हुए हैं।

  • पारंपरिक भोजन: अगर आप कोटाबाग में हैं, तो यहाँ का पारंपरिक पहाड़ी खाना जरूर चखें। पहाड़ी झोली (कढ़ी), भाट की चुड़कानी, और गहत की दाल का स्वाद आप कभी नहीं भूल पाएंगे। यहाँ के ताजे पिसे हुए 'नमक' (पिस्नू लूण) के साथ स्थानीय फलों का आनंद लेना एक अलग ही अनुभव है।

  • त्योहार: यहाँ कुमाऊँनी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। घुघुतिया, हरेला और जागर जैसे त्योहार यहाँ बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं, जो आपको यहाँ की जड़ों से जोड़ते हैं।


5. कोटाबाग क्यों आएं? (The Slow Life Experience)

आजकल की भागदौड़ में हम 'स्लो लिविंग' को भूल गए हैं। कोटाबाग आपको सिखाता है कि बिना शोर-शराबे के भी जिंदगी कितनी खूबसूरत हो सकती है।

  1. डिजिटल डिटॉक्स: यहाँ के कई होमस्टे ऐसी जगहों पर हैं जहाँ नेटवर्क भले ही कम हो, लेकिन अपनों के साथ जुड़ने का मौका पूरा मिलता है।

  2. फोटोग्राफी: अगर आप फोटोग्राफर हैं, तो यहाँ के लैंडस्केप, पक्षी और ग्रामीण जीवन आपको हजारों बेहतरीन शॉट्स देंगे।



  3. लेखन और कला: यहाँ की शांति लेखकों और कलाकारों को नई प्रेरणा देती है।


6. कैसे पहुँचें और कहाँ रुकें?

कैसे पहुँचें:

  • हवाई मार्ग: नजदीकी हवाई अड्डा पंतनगर है, जो यहाँ से लगभग 70-80 किमी दूर है।



  • रेल मार्ग: रामनगर या हल्द्वानी/काठगोदाम नजदीकी रेलवे स्टेशन हैं। वहां से आप टैक्सी या बस लेकर आसानी से कोटाबाग पहुँच सकते हैं।

  • सड़क मार्ग: दिल्ली से इसकी दूरी लगभग 260 किमी है। आप नैनीताल या रामनगर जाने वाली बस से कालाढूंढगी पहुँच सकते हैं और वहां से कोटाबाग के लिए स्थानीय वाहन मिल जाते हैं।



कहाँ रुकें: कोटाबाग में अब कई शानदार इको-रिसॉर्ट्स और होमस्टे खुल गए हैं। यहाँ रुकने का सबसे अच्छा तरीका होमस्टे है, ताकि आप स्थानीय लोगों के साथ रहकर उनके जीवन को समझ सकें।


निष्कर्ष

कोटाबाग उन लोगों के लिए एक वरदान है जो प्रकृति की गोद में सिर रखकर कुछ पल सुस्ताना चाहते हैं। यह जगह आपको दिखाती है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है। अगली बार जब आप उत्तराखंड की यात्रा का प्लान बनाएं, तो नैनीताल की भीड़ से हटकर कोटाबाग की इन हसीन वादियों में जरूर कदम रखें।

यकीन मानिए, कोटाबाग की मिट्टी की सोंधी खुशबू और यहाँ के लोगों की मुस्कान आपके दिल में हमेशा के लिए बस जाएगी।


क्या आप कोटाबाग की यात्रा के बारे में सोच रहे हैं? या आप वहां के किसी खास अनुभव को साझा करना चाहते हैं? हमें कमेंट्स में जरूर बताएं!

माता का ऐसा शक्ति पीठ जिसकी मूर्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा मां बाराही देवी मंदिर लोहाघाट चंपावत


माता का ऐसा शक्ति पीठ जिसकी मूर्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा मां बाराही देवी मंदिर लोहाघाट चंपावत

 उत्तराखंड राज्य के चंपावत जिले में लोहाघाट नगर से 60 किलोमीटर की दूरी पर घने जंगल के मध्य स्थित देवी मां का यह मंदिर भारतवर्ष के 52 शक्तिपीठों में से एक है मां बाराही देवी शक्ति पीठ जिसे देवीधुरा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है समुद्र तल से अट्ठारह सौ 50 मीटर ब्रैकेट लगभग 5000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है
maa barahi devi mandir 

 इतिहास-

    उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में चंद्र राजाओं के शासनकाल में मां चंपा देवी और ललित जिह्वा मां काली की स्थापना की गई। लाल जीभ वाली महाकाली को महर और फर्त्याल जाति के लोगों द्वारा प्रतिवर्ष बारी-बारी से नर बलि दी जाती थी कालांतर में रोहेलो के आक्रमण के समय कत्यूरी राजाओं द्वारा मां बाराही की मूर्ति को घने जंगल के मध्य एक गुफा में स्थापित कर दिया गया था। वर्तमान में इसके चारों ओर गांव बस गया है मां बाराही मंदिर के आसपास कई छोटे-बड़े ग्रेनाइट के शिलाखंड फैले हैं, जिनके बारे में बताया जाता है कि भीम द्वारा बाल क्रीड़ा के दौरान या पत्थर फेंके गए थे। कुछ  शिला खंडों पर अभी भी उंगलियों के निशान दिखाई देते हैं मंदिर के निकट दो विशाल पत्थर हैं जिनमें से एक का नाम रामशिला है इस स्थान पर पचीसी नामक जुए के चिन्ह आज भी  विद्यमान है।
गुफा द्वार

                                                      

मां बाराही देवी मंदिर की पौराणिक कथा-

 ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार इस स्थान पर गुह्य काली की उपासना का केंद्र था। इस स्थान पर काली को प्रसन्न करने के लिए वालिक, लमगड़िया, चम्याल गहडवाल खामों के महर एवं फर्त्याल जाति के लोगों द्वारा प्रतिवर्ष बारी-बारी से नर बलि दी जाती थी। मान्यताओं के अनुसार एक बुजुर्ग की तपस्या से प्रसन्न होने के बाद नर बलि की प्रथा को बंद कर दिया गया। यहां स्थापित देवी मां की मूर्ति को तांबे की पेटी में रखा गया है जिससे जिसे आज तक किसी व्यक्ति ने खुली आंखों से नहीं देखा गया है ऐसा माना जाता है कि देवी मां की मूर्ति को खुली आंखों से देखने पर उसके तेज से इतनी रोशनी निकलती है कि व्यक्ति अंधा हो जाता है।



बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) 

सावन माह में रक्षाबंधन के दिन देवी मां की मूर्ति का श्रंगार पुजारियों द्वारा आंखों में काली पट्टी बांधकर किया जाता है रक्षाबंधन के दिन प्रतिवर्ष 4 खामों द्वारा बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) का आयोजन किया जाता है इस युद्ध के दौरान एक व्यक्ति के शरीर जितना रक्त बहने तक पत्थरों से युद्ध किया जाता है वर्तमान में प्रशासन द्वारा युद्ध केवल फूल और फलों द्वारा आयोजित करवाया जाता है।

खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Story About Anglo-Nepali War of 1814

 खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Battle of Nalapani Khalanga 1814






खलंगा स्मारक द्वार
खलंगा स्मारक
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 शहीद बलभद्र सिंह खलंगा द्वार,  नालापानी 
           गोरखा सैनिक हमेशा से अपने शौर्य और पराक्रम के लिए जाने जाते रहे हैं। इतिहास की अनेकों गाथाएं इनकी वीरता का गुणगान करती हैं। गोरखाओं की वीरता ही है कि नेपाल देश आज तक कभी किसी बाहरी शक्ति का गुलाम नहीं हुआ। इतिहास में अनेकों बार नेपाल पर बाहरी आक्रमण हुए परंतु गोरखाओं ने अपनी एकजुटता और पराक्रम से नेपाल को हमेशा से एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाए रखा है। ऐसी ही एक कहानी है देहरादून के नालापानी के पास खलंगा पहाड़ी की-

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खलंगा पहाड़ी का रास्ते
 कैसे पहुंचे-
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खूबसूरत शांत जंगल खलंगा पहाड़ी 
          देहरादून में रायपुर के पास नालापानी नाम का छोटा सा गांव है, जहां से खलंगा स्मारक की दूरी मात्र 4 किलोमीटर है। नालापानी देहरादून शहर से 10 किलोमीटर दूर है, आप यहां किसी भी मौसम में आ सकते हैं। प्रतिवर्ष नवंबर माह में यहां गोरखा समुदाय द्वारा मेले का आयोजन किया जाता है।
यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं आपको जंगल, प्रकृति,  एकांत अच्छा लगता है तो यह जगह आपका इंतजार कर रही है, खूबसूरत शांत जंगलों के बीच से जाते हुए रास्ते पर अनेकों मनमोहक दृश्य हैं।

खलंगा युद्ध की कहानी-

             देहरादून की खूबसूरत पहाड़ियों मेंं से एक खलंगा पहाड़ी 31 अक्टूबर 1814 में मात्र 600 गोरखा सैनिकों ने इस पहाड़ी के ऊपर खलंगा किले पर मोर्चा संभाला था। सामने थी 3500 संख्या वाली ब्रिटिश सेना। जिनके पास उस समय की आधुनिक बंदूकें और तोपे थी। गोरखा सैनिकों के पास अपनी पारंपरिक खुखरी, तलवार और धनुष बाण थे। गोरखा सैनिकों ने खुखरी के दम पर अकेले 1000 अंग्रेज सैनिकों को मार डाला।

प्राचीन खलंगा किला
इस लड़ाई में कई अंग्रेज अफसर भी मारे गए, जिनमें मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी भी थे। इस युद्ध में गोरखा सेना का नेतृत्व कर रहे बलभद्र कुंंवर भी शहीद हो गए। ब्रिटिश सेना द्वारा कलिंगा किले का पानी रोक दिया गया। जिस कारण बलभद्र कुंंवर अपने ६० सैनिकों के साथ किले से बाहर आ गए और अंग्रेजों से युद्ध किया अंग्रेजों द्वारा उन्हें मरा हुआ घोषित कर दिया गया। परंतु कुछ लोगों का मानना है कि बलभद्र कुंवर वहां से भाग गए थे और अफगानिस्तान में सैनिक के रूप में 1835 में युद्ध में शहीद हुए।

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मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी                                                                              गोरखा  सेनापति बलभद्र कुंंवर                                                        




 गोरखा बटालियन की स्थापना 1815-



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खलंगा स्मारक 

        अंग्रेजों द्वारा गोरखा सैनिकों की बहादुरी का सम्मान किया गया। 1815 में इसी स्थान पर गोरखा सैनिकों की याद में युद्ध स्मारक बनाया गया। जिसे हम आज खलंगा स्मारक के नाम से जानते हैं। ब्रिटिश सेना में गोरखा बटालियन के नाम से एक बटालियन की स्थापना की गई। यह दर्शाता है कि ब्रिटिश सरकार गोरखाओं की वीरता का कितना सम्मान करती थी। गोरखा सैनिक सदैव युद्ध भूमि पर अपना साहस, शौर्य और पराक्रम दिखाते रहे हैं। गंगा पहाड़ी की तलहटी पर शहीद बलभद्र सिंह द्वार का निर्माण भारत सरकार द्वारा आजादी के बाद कराया गया है।
                     खलंगा स्मारक                                                                        खलंगा स्मारक  



                  भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष से मानिक शाह ने कहा था- "यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मरने से डर नहीं लगता या तो वह झूठ झूठा है या फिर गोरखा है"।
                 इस जंगल में मोर बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं यदि आप भी देहरादून के आसपास किसी अच्छी प्राकृतिक जगह को देखना चाहते हैं तो एक बार यहां जरूर जाएं।


Dedicated to Lord Shiva's elder son Kartikeya कार्तिक स्वामी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यता !!

Dedicated to Lord Shiva's elder son Kartikeya कार्तिक स्वामी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यता !!






कार्तिक स्वामी मंदिर देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में कनक चौरी गाँव से 3 कि.मी. की दुरी पर क्रोध पर्वत पर स्थित है | यह मंदिर समुद्र की सतह से 3048 मीटर की ऊँचाई पर स्थित शक्तिशाली हिमालय की श्रेणियों से घिरा हुआ है | कार्तिक स्वामी मंदिर रुद्रप्रयाग जिले का सबसे पवित्र पर्यटक स्थलों में से एक है | यह मंदिर उत्तराखंड का सिर्फ एकमात्र मंदिर है , जो कि भगवान कार्तिक को समर्पित है | भगवान कार्तिकेय का अति प्राचीन “कार्तिक स्वामी मंदिर” एक दैवीय स्थान होने के साथ साथ एक बहुत ही खूबसूरत पर्यटक स्थल भी है । मंदिर भगवान् शिव के जयेष्ठ पुत्र “भगवान कार्तिक” को समर्पित है | भगवान कार्तिक स्वामी को भारत के दक्षिणी भाग में “कार्तिक मुरुगन स्वामी” के रूप में भी जाना जाता है ।



क्रोध पर्वत पर स्थित इस प्राचीन मंदिर को लेकर मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय आज भी यहां निर्वांण रूप में तपस्यारत हैं। मंदिर में लटकाए सैकड़ों घंटी से एक निरंतर नि वहां से करीब 800 मीटर की दूरी तक सुनी जा सकती है।यह मंदिर बारह महीने श्रद्धालुओं के लिये खुला रहता है और मंदिर के प्रांगण से चौखम्बा, त्रिशूल आदि पर्वत श्रॄंखलाओं के सुगम दर्शन होते हैं। बैकुंठ चतुर्दशी पर्व पर भी दो दिवसीय मेला लगता है। कार्तिक पूर्णिमा पर यहां निसंतान दंपति दीपदान करते हैं। यहां पर रातभर खड़े दीये लेकर दंपति संतान प्राप्ति की कामना करतेे हैं, जो फलीभूत होती है। कार्तिक पूर्णिमा और जेठ माह में आधिपत्य गांवों की ओर से मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान भी किया जाता है।




कार्तिक स्वामी मंदिर के बारे में पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों को भगवान कार्तिक और भगवान गणेश से यह कहा कि उनमें से एक को पहले पूजा करने का विशेषाधिकार प्राप्त होगा , जो सर्वप्रथम ब्रह्मांड का परिक्रमा (चक्कर) लगाकर उनके सामने आएगा । भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर विश्व परिक्रमा को निकल पड़े । जबकि गणेश गंगा स्नान कर माता-पिता की परिक्रमा करने लगे।




 गणेश को परिक्रमा करते देख शिव-पार्वती ने पूछा कि वे विश्व की जगह उनकी परिक्रमा क्यों कर रहे हैं तो गणेश ने उत्तर दिया कि माता-पिता में ही पूरा संसार समाहित है। यह बात सुनकर शिव-पार्वती खुश हुए और भगवान गणेश को पहले पूजा करने का विशेषाधिकार प्राप्त दिया | इधर विश्व भ्रमण कर लौटते समय कार्तिकेय को देवर्षि नारद ने पूरी बातें बताई तो , कार्तिकेय नाराज हो गए और कैलाश पहुंचकर उन्होंने अपना मांस माता पार्वती को और शरीर की हड्डिया पिता ह्सिव जी को सौंप निर्वाण रूप में तपस्या के लिए क्रोध पर्वत पर पहुँच गए। तब से भगवान कार्तिकेय इस स्थान पर पूजा होती है और यह माना जाता है कि ये हड्डियाँ अभी भी मंदिर में मौजूद हैं जिन्हें हज़ारों भक्त पूजते हैं




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