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Tuesday, March 3, 2020

माता का ऐसा शक्ति पीठ जिसकी मूर्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा मां बाराही देवी मंदिर लोहाघाट चंपावत


माता का ऐसा शक्ति पीठ जिसकी मूर्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा मां बाराही देवी मंदिर लोहाघाट चंपावत

 उत्तराखंड राज्य के चंपावत जिले में लोहाघाट नगर से 60 किलोमीटर की दूरी पर घने जंगल के मध्य स्थित देवी मां का यह मंदिर भारतवर्ष के 52 शक्तिपीठों में से एक है मां बाराही देवी शक्ति पीठ जिसे देवीधुरा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है समुद्र तल से अट्ठारह सौ 50 मीटर ब्रैकेट लगभग 5000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है
maa barahi devi mandir 

 इतिहास-

    उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में चंद्र राजाओं के शासनकाल में मां चंपा देवी और ललित जिह्वा मां काली की स्थापना की गई। लाल जीभ वाली महाकाली को महर और फर्त्याल जाति के लोगों द्वारा प्रतिवर्ष बारी-बारी से नर बलि दी जाती थी कालांतर में रोहेलो के आक्रमण के समय कत्यूरी राजाओं द्वारा मां बाराही की मूर्ति को घने जंगल के मध्य एक गुफा में स्थापित कर दिया गया था। वर्तमान में इसके चारों ओर गांव बस गया है मां बाराही मंदिर के आसपास कई छोटे-बड़े ग्रेनाइट के शिलाखंड फैले हैं, जिनके बारे में बताया जाता है कि भीम द्वारा बाल क्रीड़ा के दौरान या पत्थर फेंके गए थे। कुछ  शिला खंडों पर अभी भी उंगलियों के निशान दिखाई देते हैं मंदिर के निकट दो विशाल पत्थर हैं जिनमें से एक का नाम रामशिला है इस स्थान पर पचीसी नामक जुए के चिन्ह आज भी  विद्यमान है।
गुफा द्वार

                                                      

मां बाराही देवी मंदिर की पौराणिक कथा-

 ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार इस स्थान पर गुह्य काली की उपासना का केंद्र था। इस स्थान पर काली को प्रसन्न करने के लिए वालिक, लमगड़िया, चम्याल गहडवाल खामों के महर एवं फर्त्याल जाति के लोगों द्वारा प्रतिवर्ष बारी-बारी से नर बलि दी जाती थी। मान्यताओं के अनुसार एक बुजुर्ग की तपस्या से प्रसन्न होने के बाद नर बलि की प्रथा को बंद कर दिया गया। यहां स्थापित देवी मां की मूर्ति को तांबे की पेटी में रखा गया है जिससे जिसे आज तक किसी व्यक्ति ने खुली आंखों से नहीं देखा गया है ऐसा माना जाता है कि देवी मां की मूर्ति को खुली आंखों से देखने पर उसके तेज से इतनी रोशनी निकलती है कि व्यक्ति अंधा हो जाता है।



बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) 

सावन माह में रक्षाबंधन के दिन देवी मां की मूर्ति का श्रंगार पुजारियों द्वारा आंखों में काली पट्टी बांधकर किया जाता है रक्षाबंधन के दिन प्रतिवर्ष 4 खामों द्वारा बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) का आयोजन किया जाता है इस युद्ध के दौरान एक व्यक्ति के शरीर जितना रक्त बहने तक पत्थरों से युद्ध किया जाता है वर्तमान में प्रशासन द्वारा युद्ध केवल फूल और फलों द्वारा आयोजित करवाया जाता है।

Wednesday, July 24, 2019

खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Story About Anglo-Nepali War of 1814

 खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Battle of Nalapani Khalanga 1814






खलंगा स्मारक द्वार
खलंगा स्मारक
deepak badhani
 शहीद बलभद्र सिंह खलंगा द्वार,  नालापानी 
           गोरखा सैनिक हमेशा से अपने शौर्य और पराक्रम के लिए जाने जाते रहे हैं। इतिहास की अनेकों गाथाएं इनकी वीरता का गुणगान करती हैं। गोरखाओं की वीरता ही है कि नेपाल देश आज तक कभी किसी बाहरी शक्ति का गुलाम नहीं हुआ। इतिहास में अनेकों बार नेपाल पर बाहरी आक्रमण हुए परंतु गोरखाओं ने अपनी एकजुटता और पराक्रम से नेपाल को हमेशा से एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाए रखा है। ऐसी ही एक कहानी है देहरादून के नालापानी के पास खलंगा पहाड़ी की-

deepak badhani
खलंगा पहाड़ी का रास्ते
 कैसे पहुंचे-
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खूबसूरत शांत जंगल खलंगा पहाड़ी 
          देहरादून में रायपुर के पास नालापानी नाम का छोटा सा गांव है, जहां से खलंगा स्मारक की दूरी मात्र 4 किलोमीटर है। नालापानी देहरादून शहर से 10 किलोमीटर दूर है, आप यहां किसी भी मौसम में आ सकते हैं। प्रतिवर्ष नवंबर माह में यहां गोरखा समुदाय द्वारा मेले का आयोजन किया जाता है।
यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं आपको जंगल, प्रकृति,  एकांत अच्छा लगता है तो यह जगह आपका इंतजार कर रही है, खूबसूरत शांत जंगलों के बीच से जाते हुए रास्ते पर अनेकों मनमोहक दृश्य हैं।

खलंगा युद्ध की कहानी-

             देहरादून की खूबसूरत पहाड़ियों मेंं से एक खलंगा पहाड़ी 31 अक्टूबर 1814 में मात्र 600 गोरखा सैनिकों ने इस पहाड़ी के ऊपर खलंगा किले पर मोर्चा संभाला था। सामने थी 3500 संख्या वाली ब्रिटिश सेना। जिनके पास उस समय की आधुनिक बंदूकें और तोपे थी। गोरखा सैनिकों के पास अपनी पारंपरिक खुखरी, तलवार और धनुष बाण थे। गोरखा सैनिकों ने खुखरी के दम पर अकेले 1000 अंग्रेज सैनिकों को मार डाला।

प्राचीन खलंगा किला
इस लड़ाई में कई अंग्रेज अफसर भी मारे गए, जिनमें मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी भी थे। इस युद्ध में गोरखा सेना का नेतृत्व कर रहे बलभद्र कुंंवर भी शहीद हो गए। ब्रिटिश सेना द्वारा कलिंगा किले का पानी रोक दिया गया। जिस कारण बलभद्र कुंंवर अपने ६० सैनिकों के साथ किले से बाहर आ गए और अंग्रेजों से युद्ध किया अंग्रेजों द्वारा उन्हें मरा हुआ घोषित कर दिया गया। परंतु कुछ लोगों का मानना है कि बलभद्र कुंवर वहां से भाग गए थे और अफगानिस्तान में सैनिक के रूप में 1835 में युद्ध में शहीद हुए।

deepak badhani                               
मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी                                                                              गोरखा  सेनापति बलभद्र कुंंवर                                                        




 गोरखा बटालियन की स्थापना 1815-



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खलंगा स्मारक 

        अंग्रेजों द्वारा गोरखा सैनिकों की बहादुरी का सम्मान किया गया। 1815 में इसी स्थान पर गोरखा सैनिकों की याद में युद्ध स्मारक बनाया गया। जिसे हम आज खलंगा स्मारक के नाम से जानते हैं। ब्रिटिश सेना में गोरखा बटालियन के नाम से एक बटालियन की स्थापना की गई। यह दर्शाता है कि ब्रिटिश सरकार गोरखाओं की वीरता का कितना सम्मान करती थी। गोरखा सैनिक सदैव युद्ध भूमि पर अपना साहस, शौर्य और पराक्रम दिखाते रहे हैं। गंगा पहाड़ी की तलहटी पर शहीद बलभद्र सिंह द्वार का निर्माण भारत सरकार द्वारा आजादी के बाद कराया गया है।
                     खलंगा स्मारक                                                                        खलंगा स्मारक  



                  भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष से मानिक शाह ने कहा था- "यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मरने से डर नहीं लगता या तो वह झूठ झूठा है या फिर गोरखा है"।
                 इस जंगल में मोर बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं यदि आप भी देहरादून के आसपास किसी अच्छी प्राकृतिक जगह को देखना चाहते हैं तो एक बार यहां जरूर जाएं।


Tuesday, July 16, 2019

Dedicated to Lord Shiva's elder son Kartikeya कार्तिक स्वामी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यता !!

Dedicated to Lord Shiva's elder son Kartikeya कार्तिक स्वामी मंदिर का इतिहास एवम् मान्यता !!






कार्तिक स्वामी मंदिर देवभूमि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में कनक चौरी गाँव से 3 कि.मी. की दुरी पर क्रोध पर्वत पर स्थित है | यह मंदिर समुद्र की सतह से 3048 मीटर की ऊँचाई पर स्थित शक्तिशाली हिमालय की श्रेणियों से घिरा हुआ है | कार्तिक स्वामी मंदिर रुद्रप्रयाग जिले का सबसे पवित्र पर्यटक स्थलों में से एक है | यह मंदिर उत्तराखंड का सिर्फ एकमात्र मंदिर है , जो कि भगवान कार्तिक को समर्पित है | भगवान कार्तिकेय का अति प्राचीन “कार्तिक स्वामी मंदिर” एक दैवीय स्थान होने के साथ साथ एक बहुत ही खूबसूरत पर्यटक स्थल भी है । मंदिर भगवान् शिव के जयेष्ठ पुत्र “भगवान कार्तिक” को समर्पित है | भगवान कार्तिक स्वामी को भारत के दक्षिणी भाग में “कार्तिक मुरुगन स्वामी” के रूप में भी जाना जाता है ।



क्रोध पर्वत पर स्थित इस प्राचीन मंदिर को लेकर मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय आज भी यहां निर्वांण रूप में तपस्यारत हैं। मंदिर में लटकाए सैकड़ों घंटी से एक निरंतर नि वहां से करीब 800 मीटर की दूरी तक सुनी जा सकती है।यह मंदिर बारह महीने श्रद्धालुओं के लिये खुला रहता है और मंदिर के प्रांगण से चौखम्बा, त्रिशूल आदि पर्वत श्रॄंखलाओं के सुगम दर्शन होते हैं। बैकुंठ चतुर्दशी पर्व पर भी दो दिवसीय मेला लगता है। कार्तिक पूर्णिमा पर यहां निसंतान दंपति दीपदान करते हैं। यहां पर रातभर खड़े दीये लेकर दंपति संतान प्राप्ति की कामना करतेे हैं, जो फलीभूत होती है। कार्तिक पूर्णिमा और जेठ माह में आधिपत्य गांवों की ओर से मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान भी किया जाता है।




कार्तिक स्वामी मंदिर के बारे में पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों को भगवान कार्तिक और भगवान गणेश से यह कहा कि उनमें से एक को पहले पूजा करने का विशेषाधिकार प्राप्त होगा , जो सर्वप्रथम ब्रह्मांड का परिक्रमा (चक्कर) लगाकर उनके सामने आएगा । भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर विश्व परिक्रमा को निकल पड़े । जबकि गणेश गंगा स्नान कर माता-पिता की परिक्रमा करने लगे।




 गणेश को परिक्रमा करते देख शिव-पार्वती ने पूछा कि वे विश्व की जगह उनकी परिक्रमा क्यों कर रहे हैं तो गणेश ने उत्तर दिया कि माता-पिता में ही पूरा संसार समाहित है। यह बात सुनकर शिव-पार्वती खुश हुए और भगवान गणेश को पहले पूजा करने का विशेषाधिकार प्राप्त दिया | इधर विश्व भ्रमण कर लौटते समय कार्तिकेय को देवर्षि नारद ने पूरी बातें बताई तो , कार्तिकेय नाराज हो गए और कैलाश पहुंचकर उन्होंने अपना मांस माता पार्वती को और शरीर की हड्डिया पिता ह्सिव जी को सौंप निर्वाण रूप में तपस्या के लिए क्रोध पर्वत पर पहुँच गए। तब से भगवान कार्तिकेय इस स्थान पर पूजा होती है और यह माना जाता है कि ये हड्डियाँ अभी भी मंदिर में मौजूद हैं जिन्हें हज़ारों भक्त पूजते हैं




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