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Wednesday, July 24, 2019

खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Story About Anglo-Nepali War of 1814

 खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Battle of Nalapani Khalanga 1814






खलंगा स्मारक द्वार
खलंगा स्मारक
deepak badhani
 शहीद बलभद्र सिंह खलंगा द्वार,  नालापानी 
           गोरखा सैनिक हमेशा से अपने शौर्य और पराक्रम के लिए जाने जाते रहे हैं। इतिहास की अनेकों गाथाएं इनकी वीरता का गुणगान करती हैं। गोरखाओं की वीरता ही है कि नेपाल देश आज तक कभी किसी बाहरी शक्ति का गुलाम नहीं हुआ। इतिहास में अनेकों बार नेपाल पर बाहरी आक्रमण हुए परंतु गोरखाओं ने अपनी एकजुटता और पराक्रम से नेपाल को हमेशा से एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाए रखा है। ऐसी ही एक कहानी है देहरादून के नालापानी के पास खलंगा पहाड़ी की-

deepak badhani
खलंगा पहाड़ी का रास्ते
 कैसे पहुंचे-
deepak badhani
खूबसूरत शांत जंगल खलंगा पहाड़ी 
          देहरादून में रायपुर के पास नालापानी नाम का छोटा सा गांव है, जहां से खलंगा स्मारक की दूरी मात्र 4 किलोमीटर है। नालापानी देहरादून शहर से 10 किलोमीटर दूर है, आप यहां किसी भी मौसम में आ सकते हैं। प्रतिवर्ष नवंबर माह में यहां गोरखा समुदाय द्वारा मेले का आयोजन किया जाता है।
यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं आपको जंगल, प्रकृति,  एकांत अच्छा लगता है तो यह जगह आपका इंतजार कर रही है, खूबसूरत शांत जंगलों के बीच से जाते हुए रास्ते पर अनेकों मनमोहक दृश्य हैं।

खलंगा युद्ध की कहानी-

             देहरादून की खूबसूरत पहाड़ियों मेंं से एक खलंगा पहाड़ी 31 अक्टूबर 1814 में मात्र 600 गोरखा सैनिकों ने इस पहाड़ी के ऊपर खलंगा किले पर मोर्चा संभाला था। सामने थी 3500 संख्या वाली ब्रिटिश सेना। जिनके पास उस समय की आधुनिक बंदूकें और तोपे थी। गोरखा सैनिकों के पास अपनी पारंपरिक खुखरी, तलवार और धनुष बाण थे। गोरखा सैनिकों ने खुखरी के दम पर अकेले 1000 अंग्रेज सैनिकों को मार डाला।

प्राचीन खलंगा किला
इस लड़ाई में कई अंग्रेज अफसर भी मारे गए, जिनमें मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी भी थे। इस युद्ध में गोरखा सेना का नेतृत्व कर रहे बलभद्र कुंंवर भी शहीद हो गए। ब्रिटिश सेना द्वारा कलिंगा किले का पानी रोक दिया गया। जिस कारण बलभद्र कुंंवर अपने ६० सैनिकों के साथ किले से बाहर आ गए और अंग्रेजों से युद्ध किया अंग्रेजों द्वारा उन्हें मरा हुआ घोषित कर दिया गया। परंतु कुछ लोगों का मानना है कि बलभद्र कुंवर वहां से भाग गए थे और अफगानिस्तान में सैनिक के रूप में 1835 में युद्ध में शहीद हुए।

deepak badhani                               
मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी                                                                              गोरखा  सेनापति बलभद्र कुंंवर                                                        




 गोरखा बटालियन की स्थापना 1815-



deepak badhani
खलंगा स्मारक 

        अंग्रेजों द्वारा गोरखा सैनिकों की बहादुरी का सम्मान किया गया। 1815 में इसी स्थान पर गोरखा सैनिकों की याद में युद्ध स्मारक बनाया गया। जिसे हम आज खलंगा स्मारक के नाम से जानते हैं। ब्रिटिश सेना में गोरखा बटालियन के नाम से एक बटालियन की स्थापना की गई। यह दर्शाता है कि ब्रिटिश सरकार गोरखाओं की वीरता का कितना सम्मान करती थी। गोरखा सैनिक सदैव युद्ध भूमि पर अपना साहस, शौर्य और पराक्रम दिखाते रहे हैं। गंगा पहाड़ी की तलहटी पर शहीद बलभद्र सिंह द्वार का निर्माण भारत सरकार द्वारा आजादी के बाद कराया गया है।
                     खलंगा स्मारक                                                                        खलंगा स्मारक  



                  भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष से मानिक शाह ने कहा था- "यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मरने से डर नहीं लगता या तो वह झूठ झूठा है या फिर गोरखा है"।
                 इस जंगल में मोर बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं यदि आप भी देहरादून के आसपास किसी अच्छी प्राकृतिक जगह को देखना चाहते हैं तो एक बार यहां जरूर जाएं।


Saturday, July 20, 2019

कुली बेगार आंदोलन

कुली बेगार आंदोलन

कुली बेगार आंदोलन के दौरान जनसभा की तस्वीर

कुली बेगार ब्रिटिश शासन काल की  ऐसी व्यवस्था थी  जिसमें  गांव  के लोगों को  सरकार की सेवा में मजदूरी करने को बाध्य थे  वह भी बिना किसी मालगुजारी  के।   गांव के पटवारी और ग्राम प्रधान को थोड़े थोड़े समय के लिए बिना किसी पारिश्रमिक के जरूरत के हिसाब से मजदूरों को अंग्रेज अफसरों के घर और दफ्तरों में मजदूरी के लिए भेजना होता था।  सबका नंबर समान रूप से आए इसके लिए इनके पास रजिस्टर रहते थे सभी लोग अपनी अपनी बारी आने पर अंग्रेज अधिकारियों की सेवा में जाने को बाध्य थे। कभी-कभी शासक लोग इन मजदूरों से अत्यंत घृणित काम जैसे गंदे कपड़े धूल वाना शौचालय की सफाई करवाना आदि करवाते थे।।
 गढ़ केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा
कुर्मांचल/कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पांडे


       सन 1913 में कुली बेगार यहां के निवासियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया।  धीरे-धीरे इस प्रथा के खिलाफ पर्वतीय लोगों में असंतोष व्याप्त हो गया।  बद्री दत्त पांडे ने अल्मोड़ा अखबार के माध्यम से कुली बेगार के खिलाफ लोगों को जागरूक करने का काम किया।  14 जनवरी 1921 को मकर सक्रांति के दिन बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में श्री बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में लगभग 40000 लोगों की एक विशाल जनसभा हुई।। जिसमें यह निश्चित किया गया कि कुली बेगार कुली उतार अब सहन नहीं किया जाएगा।  विशाल जनसमूह ने भगवान बागनाथ की पूजा कर गोमती और सरयू के जल से भगवान बागनाथ की सौगंध खाकर प्रधानों और पटवारियों से मजदूरी के रजिस्टर लेकर गोमती और सरयू संगम में प्रवाहित कर दिए।   जिसके बाद यह विद्रोह पूरे राज्य में फैल गया.. गढ़वाल में इस आंदोलन को अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने धार दी।   कुली बेगार प्रथा समाप्त होने के बाद बद्री दत्त पांडे को कुमाऊं केसरी और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा को गढ़ केसरी का खिताब दिया गया।


पंडित गोविंद बल्लभ पंत
 हरगोविंद पंत 
       महात्मा गांधी ने इस आंदोलन को के बारे में यंग इंडिया में लिखा इसका प्रभाव संपूर्ण था यह एक रक्तहीन क्रांति थी।  जिसके बाद महात्मा गांधी ने खुद बागेश्वर और चनौंदा  में गांधी आश्रम बनवाया इस आंदोलन में पंडित गोविंद बल्लभ पंत, विक्टर मोहन जोशी, हरगोविंद पंत, श्याम लाल शाह, लाला चिरंजीलाल, बैरिस्टर मुकुंदी लाल, आदि अनेकों नेताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। संभवतः 1857 की क्रांति के बाद यह एक प्रमुख आंदोलन रहा, जिसके द्वारा अंग्रेजों को यह एहसास हुआ कि पर्वतीय लोग उनके अत्याचारों से कितने कुंठित हैं।
कुली बेगार आन्दोलन के दौरान शक्ति समाचार पत्र की रिपोर्ट