खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Story About Anglo-Nepali War of 1814

 खलंगा स्मारक गोरखा सैनिकों के शौर्य की कहानी Battle of Nalapani Khalanga 1814






खलंगा स्मारक द्वार
खलंगा स्मारक
deepak badhani
 शहीद बलभद्र सिंह खलंगा द्वार,  नालापानी 
           गोरखा सैनिक हमेशा से अपने शौर्य और पराक्रम के लिए जाने जाते रहे हैं। इतिहास की अनेकों गाथाएं इनकी वीरता का गुणगान करती हैं। गोरखाओं की वीरता ही है कि नेपाल देश आज तक कभी किसी बाहरी शक्ति का गुलाम नहीं हुआ। इतिहास में अनेकों बार नेपाल पर बाहरी आक्रमण हुए परंतु गोरखाओं ने अपनी एकजुटता और पराक्रम से नेपाल को हमेशा से एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाए रखा है। ऐसी ही एक कहानी है देहरादून के नालापानी के पास खलंगा पहाड़ी की-

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खलंगा पहाड़ी का रास्ते
 कैसे पहुंचे-
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खूबसूरत शांत जंगल खलंगा पहाड़ी 
          देहरादून में रायपुर के पास नालापानी नाम का छोटा सा गांव है, जहां से खलंगा स्मारक की दूरी मात्र 4 किलोमीटर है। नालापानी देहरादून शहर से 10 किलोमीटर दूर है, आप यहां किसी भी मौसम में आ सकते हैं। प्रतिवर्ष नवंबर माह में यहां गोरखा समुदाय द्वारा मेले का आयोजन किया जाता है।
यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं आपको जंगल, प्रकृति,  एकांत अच्छा लगता है तो यह जगह आपका इंतजार कर रही है, खूबसूरत शांत जंगलों के बीच से जाते हुए रास्ते पर अनेकों मनमोहक दृश्य हैं।

खलंगा युद्ध की कहानी-

             देहरादून की खूबसूरत पहाड़ियों मेंं से एक खलंगा पहाड़ी 31 अक्टूबर 1814 में मात्र 600 गोरखा सैनिकों ने इस पहाड़ी के ऊपर खलंगा किले पर मोर्चा संभाला था। सामने थी 3500 संख्या वाली ब्रिटिश सेना। जिनके पास उस समय की आधुनिक बंदूकें और तोपे थी। गोरखा सैनिकों के पास अपनी पारंपरिक खुखरी, तलवार और धनुष बाण थे। गोरखा सैनिकों ने खुखरी के दम पर अकेले 1000 अंग्रेज सैनिकों को मार डाला।

प्राचीन खलंगा किला
इस लड़ाई में कई अंग्रेज अफसर भी मारे गए, जिनमें मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी भी थे। इस युद्ध में गोरखा सेना का नेतृत्व कर रहे बलभद्र कुंंवर भी शहीद हो गए। ब्रिटिश सेना द्वारा कलिंगा किले का पानी रोक दिया गया। जिस कारण बलभद्र कुंंवर अपने ६० सैनिकों के साथ किले से बाहर आ गए और अंग्रेजों से युद्ध किया अंग्रेजों द्वारा उन्हें मरा हुआ घोषित कर दिया गया। परंतु कुछ लोगों का मानना है कि बलभद्र कुंवर वहां से भाग गए थे और अफगानिस्तान में सैनिक के रूप में 1835 में युद्ध में शहीद हुए।

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मेजर जनरल रॉबर्ट रोलो जिलेप्सी                                                                              गोरखा  सेनापति बलभद्र कुंंवर                                                        




 गोरखा बटालियन की स्थापना 1815-



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खलंगा स्मारक 

        अंग्रेजों द्वारा गोरखा सैनिकों की बहादुरी का सम्मान किया गया। 1815 में इसी स्थान पर गोरखा सैनिकों की याद में युद्ध स्मारक बनाया गया। जिसे हम आज खलंगा स्मारक के नाम से जानते हैं। ब्रिटिश सेना में गोरखा बटालियन के नाम से एक बटालियन की स्थापना की गई। यह दर्शाता है कि ब्रिटिश सरकार गोरखाओं की वीरता का कितना सम्मान करती थी। गोरखा सैनिक सदैव युद्ध भूमि पर अपना साहस, शौर्य और पराक्रम दिखाते रहे हैं। गंगा पहाड़ी की तलहटी पर शहीद बलभद्र सिंह द्वार का निर्माण भारत सरकार द्वारा आजादी के बाद कराया गया है।
                     खलंगा स्मारक                                                                        खलंगा स्मारक  



                  भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष से मानिक शाह ने कहा था- "यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मरने से डर नहीं लगता या तो वह झूठ झूठा है या फिर गोरखा है"।
                 इस जंगल में मोर बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं यदि आप भी देहरादून के आसपास किसी अच्छी प्राकृतिक जगह को देखना चाहते हैं तो एक बार यहां जरूर जाएं।