Tuesday, March 3, 2020

कुमाऊंनी होली एक परंपरा विरासत ऐतिहासिक उत्सव

 कुमाऊनी होली

 उत्तराखंड राज्य में कुमाऊं क्षेत्र में होली का त्यौहार एक अलग अंदाज में मनाया जाता है। कुमाऊं क्षेत्र में होली का अलग ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। पहाड़ी क्षेत्रों में इस समय सर्दी के मौसम का अंत होता है और नई फसल की बुवाई का समय होता है। कुमाऊं क्षेत्र में होली का त्योहार बसंत पंचमी के दिन शुरू हो जाता है ।


होली  के प्रकार

कुमाऊं में होली तीन प्रकार से मनाई जाती है - 1. बैठकी होली 2. खड़ी होली 3. महिला होली यहां होली में केवल अबीर गुलाल का टीका ही नहीं लगता, वरन बैठकी होली और संगीत गायन की परंपरा का भी विशेष महत्व है।

 इतिहास

 कुमाऊनी होली का आरंभ मुख्य रूप से 15 वी शताब्दी में चंपावत और इसके आसपास के क्षेत्र में  चंद राजाओं के शासनकाल में हुई चंद राजवंश के प्रसार के साथ-साथ यह परंपरा संपूर्ण कुमाऊं क्षेत्र में फैल गई।

 बैठकी होली

 बैठकी होली मुख्य रूप से अल्मोड़ा और नैनीताल के मुख्य बड़े नगरों में ही मनाई जाती है, इसमें होली आधारित गीत हारमोनियम और ढोलक के साथ गाए जाते हैं। पुरुष और महिलाएं एक साथ मिलकर घरों-घरों में घूम कर अथवा किसी एक जगह एकत्रित होकर होली गीतों का गायन करते हैं। कुमाऊं के प्रसिद्ध जनकवि गिरीश गिर्दा ने बैठकी होली के कई गीत लिखे हैं, बैठकी होली में मुख्य रूप से मीराबाई से लेकर नजीर और बहादुर शाह जफर के गीत गाए जाते हैं।


 खड़ी होली 

होली त्यौहार के कुछ दिन पहले से खड़ी होली होती है।  कुमाऊं क्षेत्र की खड़ी होली पूरे भारतवर्ष में चर्चित है इसका प्रसार कुमाऊं के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलता है, इसमें ग्रामीण पुरुष टोपी और कुर्ता पजामा पहन कर ढोल दमाऊ तथा हुड़के की धुनों पर गीत गाते हैं और नाचते हैं। खड़ी होली के अधिकांश गीत कुमाऊनी भाषा में  होते हैं। होली गाने वाला दल जिन्हें स्थानीय भाषा में होल्यार कहा जाता है, बारी-बारी से गांव के प्रत्येक घर में जाकर होली गीत गाते हैं और उनकी समृद्धि की कामना करते हैं।



 महिला होली 

महिला होली में बैठकी होली की तरह गीत गाए जाते हैं, लेकिन इसमें केवल महिलाएं ही घर-घर जाकर होली गीत गाती हैं। यह कुमाऊं के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक प्रचलित है।


 चीड़ बंधन 

होलिका दहन के लिए कुमाऊं में छरड़ी के कुछ दिन पहले चीड़ की लकड़ियों से होलिका का निर्माण किया जाता है। जिसे चीड़ बंधन कहा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में चीड़ बंधन के बाद अपने होलिका की रक्षा अन्य गांव के लोगों से करनी पड़ती है, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित है दूसरे गांव की होलिका से चीड़ की लकड़ियां चुरा ली जाती हैं।

 चीड़ दहन 

 मुख्य होली के 1 दिन पहले रात को होलिका दहन किया जाता है, जिसे चीड़ दहन कहा जाता है, चीड़ दहन प्रहलाद की हिरण्यकश्यप के विचारों पर जीत का प्रतीक माना जाता है।


 छरड़ी  (छलेड़ी  धुलेड़ी)

   यह मुख्य होली का दिन है इस दिन गांव के लोग एक दूसरे पर रंग अबीर गुलाल लगाते हैं,  पारंपरिक तौर पर टेसू के फूलों को धूप में सुखाकर पानी में घोला जाता है जिससे लाल रंग का छरड़ प्राप्त होता है, जिससे कुमाऊं क्षेत्र में होली खेली जाती है। इसीलिए कुमाऊं में होली को छरड़ी कहा जाता है


 होली के अगले दिन होली टीका त्योहार मनाया जाता है इस दिन घरों में पकवान बनाए जाते हैं।

माता का ऐसा शक्ति पीठ जिसकी मूर्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा मां बाराही देवी मंदिर लोहाघाट चंपावत


माता का ऐसा शक्ति पीठ जिसकी मूर्ति को आज तक किसी ने नहीं देखा मां बाराही देवी मंदिर लोहाघाट चंपावत

 उत्तराखंड राज्य के चंपावत जिले में लोहाघाट नगर से 60 किलोमीटर की दूरी पर घने जंगल के मध्य स्थित देवी मां का यह मंदिर भारतवर्ष के 52 शक्तिपीठों में से एक है मां बाराही देवी शक्ति पीठ जिसे देवीधुरा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है समुद्र तल से अट्ठारह सौ 50 मीटर ब्रैकेट लगभग 5000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है
maa barahi devi mandir 

 इतिहास-

    उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में चंद्र राजाओं के शासनकाल में मां चंपा देवी और ललित जिह्वा मां काली की स्थापना की गई। लाल जीभ वाली महाकाली को महर और फर्त्याल जाति के लोगों द्वारा प्रतिवर्ष बारी-बारी से नर बलि दी जाती थी कालांतर में रोहेलो के आक्रमण के समय कत्यूरी राजाओं द्वारा मां बाराही की मूर्ति को घने जंगल के मध्य एक गुफा में स्थापित कर दिया गया था। वर्तमान में इसके चारों ओर गांव बस गया है मां बाराही मंदिर के आसपास कई छोटे-बड़े ग्रेनाइट के शिलाखंड फैले हैं, जिनके बारे में बताया जाता है कि भीम द्वारा बाल क्रीड़ा के दौरान या पत्थर फेंके गए थे। कुछ  शिला खंडों पर अभी भी उंगलियों के निशान दिखाई देते हैं मंदिर के निकट दो विशाल पत्थर हैं जिनमें से एक का नाम रामशिला है इस स्थान पर पचीसी नामक जुए के चिन्ह आज भी  विद्यमान है।
गुफा द्वार

                                                      

मां बाराही देवी मंदिर की पौराणिक कथा-

 ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार इस स्थान पर गुह्य काली की उपासना का केंद्र था। इस स्थान पर काली को प्रसन्न करने के लिए वालिक, लमगड़िया, चम्याल गहडवाल खामों के महर एवं फर्त्याल जाति के लोगों द्वारा प्रतिवर्ष बारी-बारी से नर बलि दी जाती थी। मान्यताओं के अनुसार एक बुजुर्ग की तपस्या से प्रसन्न होने के बाद नर बलि की प्रथा को बंद कर दिया गया। यहां स्थापित देवी मां की मूर्ति को तांबे की पेटी में रखा गया है जिससे जिसे आज तक किसी व्यक्ति ने खुली आंखों से नहीं देखा गया है ऐसा माना जाता है कि देवी मां की मूर्ति को खुली आंखों से देखने पर उसके तेज से इतनी रोशनी निकलती है कि व्यक्ति अंधा हो जाता है।



बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) 

सावन माह में रक्षाबंधन के दिन देवी मां की मूर्ति का श्रंगार पुजारियों द्वारा आंखों में काली पट्टी बांधकर किया जाता है रक्षाबंधन के दिन प्रतिवर्ष 4 खामों द्वारा बग्वाल (पत्थर मार युद्ध) का आयोजन किया जाता है इस युद्ध के दौरान एक व्यक्ति के शरीर जितना रक्त बहने तक पत्थरों से युद्ध किया जाता है वर्तमान में प्रशासन द्वारा युद्ध केवल फूल और फलों द्वारा आयोजित करवाया जाता है।